हरदोई। शाहाबाद कोतवाली क्षेत्र के एक पॉक्सो प्रकरण में पुलिस की लचर विवेचना और संदिग्ध कार्यप्रणाली पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। नाबालिग किशोरी से जुड़े गंभीर आरोपों के बावजूद विवेचक की तरफ से मामला विशेष पॉक्सो न्यायालय में पेश न किए जाने पर अदालत ने इसे न्याय प्रक्रिया से खिलवाड़ माना है। अपर जिला जज एफटीसी महिला यशपाल ने साफ कहा कि विवेचक की भूमिका प्रथम दृष्टया आरोपी को लाभ पहुंचाने की प्रतीत होती है। अदालत ने एसपी को शाहाबाद कोतवाली में तैनात उपनिरीक्षक मोहम्मद अमजद के खिलाफ विभागीय और वैधानिक कार्रवाई के आदेश दिए हैं।
शाहाबाद कोतवाली क्षेत्र के एक गांव निवासी व्यक्ति ने 11 मार्च 2026 को प्राथमिकी दर्ज कराई थी। आरोप था कि उसकी 17 वर्षीय पुत्री 10 मार्च की सुबह घर से संदिग्ध परिस्थितियों में गायब हो गई थी। परिवार ने गांव के शरमन, मनोज और देव पर बहला-फुसलाकर ले जाने का आरोप लगाया था। मामले में पुलिस को दिए शुरुआती बयान में किशोरी ने कहा था कि वह शरमन के साथ शादी करने के इरादे से गई थी और पिता द्वारा शिकायत दर्ज कराने की जानकारी मिलने पर वापस लौट आई थी। लेकिन मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 183 बीएनएस के तहत दिए गए बयान में किशोरी ने गंभीर आरोप लगाए।
पीड़िता ने बताया कि शौच के लिए घर से निकलते समय गांव के रंजीत, शरमन और मनोज उसे जबरन गाड़ी में डालकर फर्रुखाबाद ले गए थे। वहां उसके साथ अश्लील हरकतें की गईं और दुष्कर्म का प्रयास किया गया। सुनवाई के दौरान आरोपी शरमन की ओर से दाखिल जमानत अर्जी में उसे निर्दोष बताया। सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता ने जमानत का विरोध किया। इसके बावजूद अदालत ने पुलिस विवेचना में गंभीर खामियां पाते हुए आरोपी को 50 हजार रुपये के निजी मुचलके और दो जमानतदारों पर रिहा करने का आदेश दे दिया। साथ ही यह शर्त भी लगाई कि आरोपी मुकदमे के दौरान गवाहों और साक्ष्यों को प्रभावित नहीं करेगा।