हरदोई। लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। सभी दलों के प्रत्याशी घोषित हैं। यहां तक कि वोटरों के घरों की कुंडी भी सुबह से लेकर देर शाम तक खटकाई जाने लगी हैं, पर इन सबके बाद भी यदि पूछा जाए कि चुनावी मुद्दे क्या हैं, क्या बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा की बात होने लगी है। इस सवाल पर ग्रामीण वोटर जहां पहले चुप्पी साध जाते हैं, उसके बाद बोलते हैं कि भइया मुद्दे तो हमने पेपरनम मईहया पढ़ो रहए, पर हिया तउ बस जात, जात और बस जाति, ना ही कोई समस्यन की बात बस और झूठे वादन की बरसात...।
वोटरों का यह चौंकाने वाला जवाब तो हो सकता है, पर कितना गलत और कितना सही। जिले की दोनों लोस सीटों के हर उस वोटरों की जुबान पर इसका जवाब है, जो यहां के विकास व गांवों की हालत से काफी हद तक परिचित हैं। अहिरोरी क्षेत्र के किशनू बताते हैं कि गाड़ियां उनके मोहरा पर अउती हईं कहत हईं हम ता तुम्हारे आदमी हईं वोट डार अइहउ..., पर जब समस्या हम अपनी बतावत हंई तो कहत है जिताबउ ता...। कुछ ऐसा ही कहना सवायजपुर क्षेत्र के जुगनू का है। बोले, साहब जब बाढ़ आती है, तो घर के घर पानी में समां जाते हैं। आदमी कितने डूब जाते हैं इसका हिसाब प्रशासन के पास भी नहीं होता है, पर यहां भी वोट डाले जाते हैं। किस लिए वोट डाले जाते हैं, ग्रामीणों को पता ही नहीं।
जीतने के बाद शादी बारातों में सांसद पहुंचते रहे हैं, पर समस्याओं को हल करने को तो ग्रामीणों को खुद जूझना पड़ता है। अब तो ग्रामीण व संगठन मिलकर पुल बनवाने की मांग को लेकर लड़ाई लड़ रहे हैं। किशनू व जुगनू ही नहीं जिले की दोनों सीटों हरदोई व मिश्रिख पर दावेदारों की फौज सिर्फ और सिर्फ वोटों का हिसाब जातीय गणित के आधार पर लगा रही है। फिलहाल मुद्दे तो कहीं नजर नहीं आ रहे। न बिजली का जिक्र हो रहा, न पानी, न ही सड़क का। शिक्षा का स्तर सुधारने को आगे क्या प्रयास हो सकते हैं, यह तो दावेदारों को भी शायद नहीं मालूम, पर हां इतना तय है कि विसवार जातियों की गुणा गणित में दलों के रणनीतिकार सर खपाने लगे हैं।
जातियां चुनावी समर में कितनी अहम हैं। इसका अंदाजा इसी बात से भी लगाया जा सकता कि पार्टी कोई भी क्यों न हो जिस जाति के क्षेत्र में जाते हैं, तो वहां उस जाति से संबंधित अपनी पार्टी का कोई जिम्मेदार ले जाने का प्रयास करते हैं, ताकि जाति से जाति जुड़कर वोट बैंक बढ़ सके। कुल मिलाकर वोटर पार्टियों द्वारा बनाए जा रहे रिश्तों से काफी परेशान हैं। आगे मतदान में वह क्या करता है, इसका अंदाजा तो मतदान व परिणाम आने के बाद ही लग सकेगा।
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जरूरत नंबर एक---
जिले के 1653 गांवों में बिजली ही नहीं
हरदोई। हर इंसान की मूलभूत जरूरतों में बिजली अहम है, पर जिले का कुछ ऐसा दुर्भाग्य रहा कि सांसद तो हर बार चुनते चले आ रहे हैं, पर बिजली पूरे जिले के गांवों में आज तक नहीं टिमटिमा सकी है। हैरानी की बात यह है कि जिले के 1653 ग्रामों व मजरों में आज तक बिजली के बल्ब नहीं टिमटिमा पाए हैं। यह बात बिजली विभाग की डायरी कह रही है, जबकि 768 ग्रामों व मजरों में बिजली पहुंचाने का दावा किया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि 1653 गांवों में क्या हर आबादी ने वोट ही नहीं डाला था।
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जरूरत नंबर दो---
गांव को छोड़िए! शहरियों के भी कंठ सूखे
हरदोई। पानी इसे भी अगर लोगों ने मुद्दों से गायब कर दिया, तो शायद वह अपने जीवन से ही बेईमानी कर जाएंगे, क्योंकि यह तो सभी जानते हैं कि जल ही जीवन है, लेकिन जिले की ग्राम पंचायताें में चाहे 1800 से ऊपर आदर्श तालाब बने हों, चाहे कितनी ही टंकियों या हैंडपंपों को लगवा दिया गया हो, पर सभी दावे हवा में और कागजों पर ही दिखाई देते हैं। वास्तविकता में ग्रामीणों से लेकर शहरों तक में पेयजल की समस्या बलवती है, पर दावेदारों की जुबां से गायब हैं।
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जरूरत नंबर तीन---
जर्जर नहीं दोस्त, यहां तो सड़क गायब है
हरदोई। निर्माण एजेंसियों की फाइलों पर हर वित्तीय वर्ष में अरबों का खर्च सड़क निर्माण में जाया होना दिखाया जाता है, पर क्या वास्तविकता में इनका आधा भी खर्च हो रहा होता, तो शायद शहर के बिलग्राम चुंगी से लेकर राधा नगर एक उदाहरण है। इसके अलावा अहिरोरी के साहुलपुर से लेकर भीठा, अंटवा, सवायजपुर, शाहाबाद, पिहानी मार्ग आदि पर हर जगह अब सड़क ही गायब हो गई है। आए दिन यहां से गुजरने वालों की हड्डियां या तो चटक रही हैं या फिर लोग चुटहिल हो रहे हैं।
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जरूरत नंबर चार---
कटरी के बाशिंदों की जान की कीमत नहीं!
हरदोई। शायद कटरी क्षेत्र के बाशिंदों की जान की कोई कीमत ही नहीं, पर वोट की कीमत तो बहुत है! यह तो हर पार्टी के जिले के जिम्मेदार से लेकर लखनऊ व दिल्ली में बैठे पार्टी के मुखिया तक जानते हैं, पर जब हर साल कई सैकड़ा जान लीलने वाली बाढ़ का यहां से खात्मा करने की बात आती है, तो सभी पार्टियों के सांसद आज तक खामोश हैं और बाढ़ आज भी आती है और कटरी चिल्लाती है। यहां भी अर्जुन पुल आदि को लेकर अब खुद लोग सड़कों पर आए हैं, पर सांसद सिर्फ सभाओं में मांग करते रह जाते हैं।
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मुद्दे तो बहुत हैं, पर दावेदार भूले हैं!
सदर तहसील क्षेत्र
औद्योगिक क्षेत्र पिछड़ा होने से रोजगार के अवसर नहीं, उच्च तकनीकी शिक्षा के लिए नहीं खुल सका कोई संस्थान, हरदोई-कानपुर रूट पर रेलवे ट्रैक न होने से विकास रुका, बाईपास और ट्रांसपोर्ट नगर न बनने से रोज लगते जाम, सीवर लाइन न पड़ना नगर के बनी प्रमुख समस्या
बिलग्राम तहसील क्षेत्र---
कृषि उत्पादन मंडी समिति का नहीं हो सका निर्माण, शुगर मिल की जमीन अधिगृहीत होने पर भी न खुल सकी, राजकीय डिग्री कॉलेज व टेक्निकल स्कूल न बन सका, फर्रुखाबाद से बिलग्राम होकर कानपुर जाने वाली रेलवे लाइन नहीं पड़ सकी, तहसील क्षेत्र में एक भी न बन सका रोडवेज बस स्टैंड
संडीला तहसील क्षेत्र---
औद्योगिक क्षेत्र की क रीब 10 फैक्ट्रियों का ताला न खुल सका, खेलकूद के लिए कोई भी स्टेडियम का न हो सका निर्माण, उच्च शिक्षा व टेक्निकल शिक्षा के लिए न खुल सके कॉलेज, ओवर ब्रिज न बनने से रेलवे क्रासिंग पर आज भी लगता जाम, रोडवेज बस स्टैंड न होने से यात्रियों को सड़क पर करना पड़ता इंतजार
शाहाबाद तहसील क्षेत्र---
उच्च शिक्षा व टेक्निकल शिक्षा के लिए नहीं खुले कॉलेज, मुंसिफ कोर्ट का भवन बना, पर नहीं हो सकी शुरुआत, अग्निशमन केंद्र की स्थापना न होने से आग से होता नुकसान, राजकीय महिला अस्पताल का अस्तित्व भी संकट में फंसा, रोडवेज बस स्टैंड न होने से सड़क पर यात्री करते बस का इंतजार
सवायजपुर तहसील क्षेत्र---
रामगंगा नदी पार करने को आज भी लोगों को लेना पड़ता नाव का सहारा, तहसील मुख्यालय पर कोतवाली व फायर स्टेशन की नहीं हो सकी स्थापना, क्षेत्र में नहरें हैं, पर अर्से से इसमें नहीं पहुंच रहा पानी, उच्च शिक्षा व तकनीकी शिक्षा को नहीं खुल सका कोई कॉलेज, कृषि उत्पादन मंडी समिति न होने से किसान भटक रहे