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कहां मन रहा महिला रोजगार डे!

Tue, 22 Oct 2013 05:41 AM IST
Hardoi
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हरदोई। ग्रामीण अंचलों में भी महिलाओं को सशक्त करने के उद्देश्य से शासन द्वारा काफी समय पूर्व मनरेगा के तहत सप्ताह में एक बार महिला रोजगार दिवस मनाने के निर्देश दिए गए थे। महिला कर्मियों की संख्या को बढ़ाने को मनरेगा में महिला मेट रखने पर जोर देने के दावे किए गए थे, पर निर्देश भी हवा हो गए।
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सप्ताह में एक बार तो छोड़िए माह में भी एक बार महिला रोजगार दिवस कहीं मनता नहीं दिखाई देता है। शासन ने महिला सशक्तीकरण पर जोर देते हुए माना कि मनरेगा में पुरुषों की अपेक्षा महिला श्रमिकों को काम में थोड़ी सी छूट हमेशा से दी जाती रही है, पर इसके बाद भी महिला श्रमिकों की वृद्धि नहीं हो पा रही है। इसी को देखकर शासन ने कुछ अलग निर्णय लिया था। शासन द्वारा डीएम को भेजे निर्देशों में बताया गया था कि मनरेगा में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है, जिसे बढ़ाने को महिला वर्कर का मेट के रूप में नियुक्त करने तथा महिलाओं के लिए पृथक से स्पेशल प्रोजेक्ट चिह्नित करने की जरूरत पर जोर देने के निर्देश दिए गए थे। अन्य निर्देशों में यह कहा गया था कि महिलाओं की भागीदारी का प्रतिशत बहुत कम है।
इनकी भागीदारी बढ़ाने को गांव में हर सप्ताह में एक दिन निर्धारित किया जाए, जो महिला रोजगार दिवस के नाम से जाना जाए। उस दिन ज्यादा से ज्यादा महिलाओं के जॉब कार्ड बनवाने, उनके खाते खुलवाने तथा उन्हें रोजगार प्रदान करने का कार्य कराया जाए। महिला प्रधानों को अलग से बुलाकर विकास खंड स्तर पर उनसे वार्ता करने और उनको इस आशय से समझाने की योजना में ज्यादा से ज्यादा महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के निर्देश थे, पर सारे निर्देश अब तक हवा में ही दिखाई दे रहे हैं। जिले की 1101 ग्राम पंचायतों में कहीं भी किसी भी स्तर से इन निर्देशों का पालन नहीं हो पा रहा है। ग्रामीण महिलाओं का यहां तक कहना है कि आज तक उन्होंने अपनी ग्राम पंचायतों में तो इस तरह का कोई महिला रोजगार दिवस मनाते नहीं देखा है।
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ग्राम पंचायत स्तर पर अफसरों का कहना है कि इस दिवस को लेकर जब कब ग्रामीण महिलाओं को बुलाकर उनको समझाया जाता है और मनरेगा में कार्य करने को प्रेरित किया जाता है। उधर, अब तक के हुए इतने प्रयासों के बाद भी अब तक जिले की 1101 ग्राम पंचायतों में किसी भी ग्राम पंचायत में मनरेगा कार्यों की बागडोर मेट के रूप में किसी महिला कर्मी ने नहीं संभाली है। इसके पीछे ग्राम पंचायत अफसरों, प्रधानों का तर्क रहता है कि आज भी इतना जागरूक होने के बाद भी महिलाएं घरों से बाहर तो आ जाती हैं और महिला श्रमिक के रूप में कार्य भी कर रही हैं, पर मेट की भूमिका में नजर नहीं आ पा रही है।
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‘शासनादेशों का पालन किया जा रहा है। समय समय पर होने वाली समीक्षा में भी इन बातों के प्रति जवाब तलब किया जाता है। महिला श्रमिकों की संख्या बढ़ी भी है। यदि शिकायतें कहीं हैं, तो बीडीओ से ग्राम पंचायतों में इनका पालन करवाने को निर्देशित करेंगे।’ सीडीओ वियोधन
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