हापुड़। अपर जिला जज एवं सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश पॉक्सो एक्ट कोर्ट ने पांच वर्ष की बच्ची से दुष्कर्म करने के मामले में शुक्रवार को निर्णय सुनाया। जिसमें न्यायाधीश ने मामले के आरोपी को दुष्कर्म का दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा (अभियुक्त के शेष प्राकृत जीवनकाल) सुनाई है। साथ ही दोषी पर पांच हजार तीन सौ रुपये का अर्थदंड भी लगाया है।
विशेष लोक अभियोजक पॉक्सो हरेंद्र त्यागी व विजय सिंह चौहान ने बताया कि पिलखुवा कोतवाली क्षेत्र के एक गांव निवासी व्यक्ति ने कोतवाली में तहरीर दी। जिसमें उसने कहा कि 14 मई 2023 वह अपने कमरे में आराम कर रहा था। तभी उसकी पांच वर्षीय पुत्री खेलते हुए पास वाले कमरे में किराए पर रह रहे रंजीत महतो पुत्र देवधर महतो निवासी सनाह, थाना शाहपुर कमाल, जिला बेगुसराय बिहार के पास चली गई। जिस पर आरोपी रंजीत महतो ने कमरे का दरवाजा बंद करके होम थियेटर तेज आवाज में बजा दिया। जिसके बाद आरोपी रंजीत महतो ने बच्ची के साथ दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया कुछ देर बाद उसकी पुत्री रोती हुई उसके पास आई और घटना के बारे में बताया। जिसके बाद वह और उसकी पत्नी आरोपी को पकड़कर थाने ले गए। पुलिस ने मामले की पॉक्सो सहित विभिन्न धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की और उसके आरोप पत्र नौ जून 2023 को न्यायालय में पेश किए। मामले की सुनवाई अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/ विशेष न्यायाधीश पॉक्सो एक्ट कोर्ट में चल रही थी। जहां पर न्यायाधीश श्वेता दीक्षित ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद शुक्रवार को मामले में निर्णय सुनाया। जिसमें न्यायाधीश श्वेता दीक्षित ने आरोपी रंजीत महतो को दुष्कर्म का दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। न्यायाधीश ने आजीवन कारावास की सजा को लेकर स्पष्ट रुप से कहा है कि यह सजा अभियुक्त के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए है। साथ ही दोषी पर पांच हजार तीन सौ रुपये का अर्थदंड भी लगाया। अर्थदंड की अस्सी प्रतिशत धनराशि पीड़ित परिवार को दी जाएगी।
दो लाख रुपये देने के आदेश-
न्यायाधीश श्वेता दीक्षित ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को पीड़िता के पिता को दो लाख रुपये की प्रतिपूर्ति धनराशि देने के भी आदेश किए है। साथ ही आदेश में यह भी कहा है कि प्राधिकरण के पास उक्त धनराशि देने के लिए फंड न होने पर जिलाधिकारी राज्य सरकार से धनराशि प्राप्त कर एक माह के अंदर पीड़िता के पिता को दे।
मात्र आठ माह में आया फैसला
न्यायालय ने मामले को गंभीरता से लेते हुए तेजी से सुनवाई की। मामले में सुनवाई के लिए जहां पुलिस व सरकारी अधिवक्ता को तेजी से सभी गवाह व साक्ष्य न्यायालय में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। वहीं, मामले की सुनवाई के लिए कोई लंबी तारीख भी नहीं लगाई। न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए जल्दी-जल्दी तारीख नियत की। जिसके चलते न्यायालय ने मुकदमा दर्ज होने के बाद से आठ माह व कोर्ट में पुलिस द्वारा आरोप पत्र प्रस्तुत करने के मात्र सात माह के बेहद कम समय में ही निर्णय सुना दिया। साथ ही न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखे हुए आरोपी को मुकदमे की पूरी सुनवाई के दौरान जमानत भी नहीं दी थी। जिसके चलते आरोपी मुकदमे की पूरी सुनवाई के दौरान जेल में ही बंद रहा है।