आज मदर्स डे है। भारत सहित पूरे विश्व में मदर्स डे के उपलक्ष्य में ‘मां’ शब्द की महिमा का गुणगान किया जाएगा, वहीं जीवन के अंतिम पड़ाव में वृद्धाश्रम में रहने वाली बुजुर्ग महिलाओं को इस मौके पर भी कलेजे के टुकड़ों का साथ तो दूर उनकी हमदर्दी तक नहीं मिल सकेगी।
बुढ़ापे में धुंधलाती आंखें अपने लाडलों के आने की बाट जोह रही हैं। उन्हें अब भी उम्मीद है कि उनके बच्चे जरूर लौटेंगे और उनके कांपते हाथों को सहारा देंगे।
कांधला की रामकली बताती हैं कि जिन दो बेटों की तरक्की के लिए उन्होंने जिंदगी भर संघर्ष किया, वही शादी होने पर बेगाने हो गए। कई महीने से उनका फोन तक नहीं आया। बेटी ने भी कभी हालचाल जानने की कोशिश नहीं की।
एटा की बेला का कहना है कि दो बेटे और दो बेटियों को पढ़ा लिखाकर बड़ा अफसर बनाने की चाहत में धर्म और समाज से जुड़े संस्कार उन्हें नहीं दे पाई, जिसका खामियाजा अब जीवन के आखिरी पड़ाव में भुगतना पड़ रहा है। चारों ने एक साल से हालचाल तक नहीं लिया है।
तमिलनाडु की कुपम्मा का कहना है कि आधुनिकता की चकाचौंध ने रिश्ते-नातों की रंगत फीकी कर दी है। अपने जिगर के टुकड़ों की एक झलक देखने को आंखें हर समय बेताब रहती हैं। बैंक मैनेजर पति की मौत के बाद बेटी की शादी तक तो सब कुछ ठीक रहा,
लेकिन सरकारी सर्विस कर रहे दोनों बेटों की शादी होते ही वह अपने ही घर में बेगानी हो गईं। बड़ौत की सुशीला का कहना है कि मदर्स डे पर तीन बेटे और दो बेटियों में एक के आने की पूरी उम्मीद थी, जिसको लेकर उसकी बूढ़ी आंखें दिनभर टकटकी लगाए रहीं,
लेकिन पांच बच्चों में से कोई नहंी आया। तीनों बेटों के अच्छे खासे कारोबार हैं और बेटी भी अच्छे परिवारों में ब्याही हैं, लेकिन फिर भी कोई सुध नहीं लेता है। यहां कर सकते हैं संपर्क, मोबाइल नंबर 8527293833, 9412549779