1990 तक साफ थी काली, तीस साल में हुई दूषित
हापुड़। हापुड़ के 12 से अधिक गांवों से होकर गुजर रही काली नदी का स्वरूप हमेशा ऐसा नहीं था। इसे इंसानों की कारगुजारियों ने ही दूषित किया है। बुजुर्ग बताते हैं कि 1990 तक इसमें पानी साफ था और इसका प्रयोग दूसरी नदियों की तरह पशुओं को नहलाने और सिंचाई आदि करने के काम भी लाया जाता था।
काली नदी का इतिहास वर्षों पुराना है, इस नदी की स्थिति सदा ऐसी नहीं रही। वर्ष 1990 से पहले तक यह आम नदियों की तरह ही बहती थी और इसके पानी का रंग भी काला नहीं था। हां इसमें उस दौरान पानी की मात्रा अधिक रहती थी।-धनावली अट्टा निवासी मेघराज शास्त्री।
मुझे याद है कि इस नदी के पानी को हम दूसरे रजवाहों, नहरों की तरह ही देखते थे। इसमें पशुओं को नहलाने के साथ कभी कभी शरारती बच्चे भी गोता लगा लिया करते थे। इसके पानी को सिंचाई में भी प्रयुक्त किया जाता था।-राजेंद्र सिंह, धनावली अट्टा।
काली नदी की इस दुर्दशा के लिए स्थानीय लोग ही जिम्मेदार हैं। जब इसका पानी थोड़ा थोड़ा दूषित होने लगा तो स्थानीय लोगों ने कोई ध्यान नहीं दिया। औद्योगिक क्षेत्रों का पानी इसमें डलता गया और उस समय कोई विरोध नहीं हुआ। जिसका नतीजा आज हम सब भुगत रहे हैं।-सेवा निवृत्त प्रिंसिपल सरदार सिंह वर्मा, मतनौरा।
सत्तर अस्सी के दशक में इस नदी की स्थिति काफी बेहतर थी और बरसात के दिनों में इसमें बाढ़ आ जाया करती थी। पानी कुछ गांवों में भी भर जाता था, लेकिन यह नदी कभी भी घातक नहीं रही। अब गांव में इसकी वजह से कितनी ही जाने जा चुकी हैं।-उर्मिला देवी, गांव कनिया।