रोक के बाद भी धड़ल्ले से जलाई जा रही पराली
गढ़मुक्तेश्वर। एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी धान की पुआल, गन्ने की पत्ती जलाने पर कोई रोक नहीं लग पा रही है। मेला स्थल पर ही किसान धड़ल्ले के साथ फसलों के अवशेष(पराली) जला रहे हैं।
धान की पुआल, गन्ने की पत्ती समेत फसलों के अवशेष जलाने से वायुमंडल में कार्बन मोनोऑक्साइड और कार्बन डाई ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैस फैल जाती हैं, जिनसे ओजोन परत को नुकसान पहुंचता है और नाइट्रोजन चक्र भी प्रभावित हो जाता है। वहीं फसलों का उत्पादन प्रभावित हो रहा है, बढ़ते प्रदूषण के मद्देनजर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल समेत सुप्रीम कोर्ट ने पराली जलाने पर पूरी तरह रोक लगाने के साथ ही उल्लंघन करने वालों से जुर्माना वसूलने का आदेश दिया हुआ है। कृषि विभाग द्वारा जागरूक करने के बाद भी रूढ़िवादी खेती प्रथा के चलते किसान पराली जलाने से बाज नहीं आ रहे हैं। पौराणिक खादर मेला स्थल वाले जंगल में गन्ना और धान की कटाई कर रहे अधिकांश किसान धड़ल्ले के साथ फसलों के अवशेष फूंक रहे हैं। लेकिन मेला क्षेत्र में तैयारियों में जुटा पुलिस-प्रशासनिक अमला इस तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहा है।
कृषि विभाग के प्राविधिक सहायक सतीश चंद्र शर्मा का कहना है कि धान की पुआल, गन्ने की जड़, पत्ती और फसलों के अवशेष जलाने पर पूरी तरह रोक लगी हुई है, क्योंकि इनसे निकलने वाली हानिकारक गैस इंसानों और पशु-पक्षियों की जिंदगी के साथ ही फसलों की उन्नत पैदावार के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही हैं। इसके अलावा वायुमंडल में प्रदूषण फैलने से सर्दी के मौसम में कई तरह की दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं।
एसडीएम विजयवर्धन तोमर का कहना है कि फिलहाल पराली जलाने का मामला उनके संज्ञान में नहीं है, लेकिन टीम भेजकर मौके की जांच कराई जाएगी। पराली जलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।