देवोत्थान एकादशी शुक्रवार को है। आज अबूझ साया होने के चलते नगर में शादी-ब्याह की धूम रहेगी। ब्याह-शादी जैसे मांगलिक कार्य प्रारंभ होने पर शुक्रवार को फिर बैंडबाजों की धुन और शहनाइयों की गूंज सुनाई देने लगेगी।
बता दें कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देव शयनी एकादशी को भगवान विष्णु क्षीर सागर में जाकर शयन करते हैं, जो चार माह बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को शयन स्थल से जागकर तुलसी से विवाह रचाते हैं।
इस दिन को देवोत्थान एकादशी अथवा देव प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। पंडित सुरेंद्र प्रसाद शर्मा और रमाशंकर तिवारी ने बताया कि गढ़ खादर के महाभारत कालीन कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान मेले में आने वाले भक्त विभिन्न पर्व मनाते हैं।
जिनमें गोपाष्टमी और आंवला नवमी के बाद तीसरा पर्व देवोत्थान एकादशी होता है, जिससे चार माह से बंद चल रहे मांगलिक कार्य फिर से प्रारंभ हो जाते हैं।
नट समुदाय में पूरे साल में सिर्फ देवोत्थान एकादशी के दिन ही शादी होती हैं। हैदरपुर, सलोनी, धनपुरा समेत गढ़ क्षेत्र के कई गांवों में नट समुदाय के लोग रहते हैं। समुदाय में देवोत्थान एकादशी के मद्देनजर शादियों को लेकर जोरों पर तैयारी चल रही हैं।
ओमप्रकाश, दिनेश, रघुबीर का कहना है कि नट समाज में यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है, जिसका समाज के लोग सदियों से पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ पालन करते आ रहे हैं।