गन्ने की कटाई और गेहूं की निराई-गुड़ाई होने से किसान-मजदूर तबका काम के अतिरिक्त बोझ में दबा हुआ है, इसके बाद भी यह वर्ग वोट को लेकर बेहद गंभीर नजर आ रहा है। इनका कहना है कि काम का झंझट तो हर दिन रहता है,
लेकिन प्रदेश की दिशा और दशा तय करने की मुहिम में भागीदार बनने का मौका पांच साल में एक बार ही मिलता है। किसान वर्ग को भारतीय संस्कृति में अन्नदाता कहा जाता है, क्योंकि वह हाड़तोड़ मेहनत-मशक्कत कर लोगों को अनाज मुहैया कराता है।
इस वर्ग को दिन-रात मशक्कत करनी पड़ती है। फरवरी का महीना इनके लिए काफी व्यस्तता वाला रहता है, क्योंकि एक तरफ गन्ने की कटाई जोरों पर रहती हैं तो गेहूं में निराई और गुड़ाई का काम भी जोर पकड़ लेता है।
इस समय खेतों में खड़े गन्ने की कटाई होने से जहां किसान को फुरसत नहीं है, वहीं मवेशियों के चारे और मजदूरी पर कटाई करने वाले भी कामकाज में फंसे हुए हैं, इसके बाद भी किसान-मजदूर तबके में वोटिंग को लेकर खासा उत्साह है।
पूर्व प्रधान श्रद्धानंद गुर्जर, चुन्ने खां, मुखिया मदहत अली, अनिल चौधरी, कृष्ण त्यागी का कहना है कि इन दिनों किसान-मजदूर काम के बोझ तले दबे हुए हैं, लेकिन इसी दौरान 11 फरवरी को वोटिंग भी होनी है।
मतदान को लेकर किसान-मजदूर पूरी तरह गंभीर हैं, क्योंकि अगर वोटिंग से मुंह मोड़ा तो फिर अयोग्य प्रत्याशी की जीत और अनचाही पार्टी की सरकार बनने से पांच साल तक पछताना पड़ेगा।