नोटबंदी के कारण जिले के 16 शीतगृहों में लगभग एक लाख कट्टा बीज समेत करीब तीन लाख कट्टे आलू खरीददार नहीं मिलने के चलते रखे हुए हैं। यह आलू किसानों ने चटकी के समय बेचने के लिए रोक रखा था।
अब हालत यह है कि कोई शीतगृह का किराया देकर आलू की निकासी के लिए भी तैयार नहीं है। जिलेभर के शीतगृहों में पिछले सीजन में करीब 25 लाख से अधिक कट्टा आलू रखा गया था। सीजन में आलू का रेट 350 से 400 रुपये कट्टा (50 किलो) था।
हालांकि, जून जुलाई में आलू का रेट 600 से 700 रुपये कट्टा तक पहुंच गया था। सीजन के प्रारंभ में ही यह हवा उड़ी की आलू इस बार एक हजार रुपये कट्टा बिकेगा। किसान दाम बढ़ने का इंतजार करते रहे,
लेकिन बाजार में नया आलू आते ही पुराने आलू के रेट गिरने लगे और 400 से 500 रुपये कट्टा रह गए। वहीं, नोटबंदी के चलते शीतगृहों में रखे आलू के कट्टों का कोई खरीदार आसानी से नहीं मिल रहा है।
मंडी में 200 से 250 रुपये प्रति कट्टा आलू बिक रहा हैं। वहीं, पंजाब से आ रहा नया आलू का कट्टा 400 से 500 रुपये का बिक रहा है। शीतगृह मालिक एसोसिएशन के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया कि नियमानुसार 30 सितंबर तक हर हालत में शीतगृहों से आलू बाहर हो जाने चाहिए थे।
इस बार मजबूरी में अब तक मशीनें चलाकर आलू को खराब होने से बचाया गया है। अगर कुछ और दिनों में किसानों ने आलू नहीं निकाला तो विकट समस्या खड़ी हो जाएगी। इससे किसानों के साथ ही शीतगृह मालिकों को नुकसान होगा।
किसान मंदी के चक्कर में अगर आलू नहीं निकाल पाते हैं और किराए के बदले में छोड़ देते हैं तो भी किराए की भरपाई नहीं हो पाएगी। आलू भंडारण का किराया 240 रुपये क्विंटल (शुगर फ्री) है, जबकि 210 रुपये क्विंटल सादा का किराया है।
वहीं, मंडियों में पुराने आलू 200 रुपये प्रति कट्टा बिक रहे हैं। वहीं, कुछ किसान ऐसे भी हैं जो मंदे में आलू नहीं निकालते, बल्कि शीतगृह मालिक को नोटिस भेज देते हैं कि उनके आलू का ध्यान नहीं दिया गया।