सुशील त्रिपाठी
हमीरपुर। वीरभूमि बुंदेलखंड अपनी परंपराओं के लिए जानी जाती है। जनपद के कुंडौरा गांव में होली का रंग कुछ अलग ही अंदाज में चढ़ता है। यहां महिलाएं फाग खेलतीं हैं वहीं पुरुष गांव छोड़ देते हैं।
परंपरा के अनुसार जैसे ही महिलाओं की फाग निकलने का समय आता है पुरुष या तो अपने घरों में खुद को सीमित कर लेते हैं या फिर खेत-खलिहान की ओर चले जाते हैं। गांव की बुजुर्ग महिलाओं के मुताबिक यह परंपरा करीब 500 साल पुरानी मानी जाती है। मान्यता है कि महिलाओं को इस दिन पूरी स्वतंत्रता और उत्सव का अधिकार दिया जाता है। यदि किसी पुरुष ने परंपरा का उल्लंघन कर महिलाओं की फाग देखने की कोशिश की तो उसे लट्ठ लेकर खदेड़ दिया जाता है।
महिलाओं की फाग का शुभारंभ गांव के प्राचीन रामजानकी मंदिर से होता है। दूज के दिन सुबह-सुबह गांव की सभी महिलाएं यहां एकत्रित होती हैं। ढोल-मजीरा, गाजे-बाजे और लोकगीतों के साथ फाग की शुरुआत होती है। मंदिर से निकली यह फाग टोली पूरे गांव की गलियों और मोहल्लों में घूमती है। रंग और गुलाल उड़ाते हुए महिलाएं घूंघट में ठुमके लगाती हैं। पारंपरिक फाग गीत गाते हुए उत्सव का आनंद लेतीं हैं। खेरापति बाबा मंदिर परिसर में सामूहिक नृत्य और गीत-संगीत के साथ कार्यक्रम का समापन होता है।
फोटो और वीडियो पर रहती है सख्त पाबंदी
इस परंपरा की सबसे खास बात यह है कि महिलाओं की होली का कोई पुरुष फोटो या वीडियो नहीं बना सकता। यहां तक कि कैमरा लेकर आसपास दिखना भी नियम के खिलाफ माना जाता है। यदि कोई चोरी-छिपे तस्वीर लेने की कोशिश करता है, तो उस पर जुर्माना लगाया जाता है। बताया जाता है कि यह परंपरा पूर्वजों द्वारा शुरू की गई थी और आज भी पूरे सम्मान के साथ निभाई जा रही है।
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एक साथ ठुमके लगातीं हैं सास और बहुएं
कुंडौरा गांव की होली में प्रत्येक घर की महिलाएं शामिल होतीं हैं। नई नवेली बहू हो अथवा वृद्धाएं भी एक साथ धमाल मचातीं हैं। विवाह के बाद जब कोई बेटी अपने मायके आती है तो वह भी इस परंपरा का हिस्सा बनती है। महिलाएं एक-दूसरे को गुलाल लगाकर सम्मान देती हैं। यहां एक दिन के लिए सामाजिक भूमिकाएं बदल जाती हैं और महिलाओं को केंद्र में रखकर उत्सव मनाया जाता है। गांव के पुरुष भी इस परंपरा का सम्मान करते हैं और निर्धारित समय तक गांव से दूर रहते हैं। महिलाओं की फाग समाप्त होने के बाद ही वे दोबारा सामान्य गतिविधियों में लौटते हैं।