काव्य गोष्ठी में रचना पढ़ते कवि।
- फोटो : अमर उजाला
अखिल भारतीय साहित्य परिषद के बैनर तले आयोजित सरस काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए बुंदेलखंड के गीतकार नाथूराम पथिक ने कांच का खिलौना है जिंदगी कितना भी संभालो टूट जाती है, इतनी नाजुक है गांठ सांसों की ठोकर लगी तो छूट जाती है सुनाकर वाहवाही लूटी।
मुख्यालय के कल्पवृक्ष स्थल में गोष्ठी का आयोजन कवि स्व.राधेश्याम सोनी की त्रयोदशी के अवसर पर हुआ। शुभारंभ जगदीशचंद्र जोशी ने ‘कैसे कहूं मधुमास लगा जब फूलन लागी मन की क्यारी, बाग तड़ाग कदंब की कुंजन गुजन करती कोयल कारी’ गीत सुनाया तो बद्रीप्रसाद वर्मा ने ‘जग में आते जाते है तमाम, मृत्यु न देखती है सुबह शाम।
रोती प्रकृति है जन-जन बेहाल, छोड़ गए जग मधुवन का श्याम’ सुनाकर जीवन का सार तत्व समझाया। रामबिहारी आर्य ने पढ़ा- हे गुरुवर तुमको प्रणाम, हे गुरुवर तुमको लाखाें प्रणाम, हर क्षेत्र में आपको मिला सम्मान, हे गुरुवर तुम थे महान।
इसके अलावा कवि हरीराम गुप्ता निर्पेक्ष, विजय बहादुर पटैरिया, शिवदीप सिंह, आचार्य दिनेशचंद्र आर्य, कैलाश प्रसाद सोनी, कमल किशोर कमल ने भी अपनी रचनाएं पढ़ी। इस दौरान पर रामप्रकाश गुप्ता, राकेश कुमार कनौजिया, प्रखर, शिखर आदि मौजूद रहे।