फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

शल्लेश्वर मंदिर के गर्भ में छिपे हैं कई अनबुझे पहलू

Mon, 03 Aug 2015 12:05 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/हमीरपुर
विज्ञापन
विज्ञापन
सरीला का शल्लेश्वर मंदिर लोगों के लिए आस्था व श्रद्धा का केंद्र है। चंदेलकालीन इस शिव मंदिर के गर्त में तमाम ऐतिहासिक अनबुझे पहलू समाए हैं। मंदिर के मुख्य द्वार पर लगा शिलालेख आज तक कोई पढ़ नहीं सका है। शिव मंदिर का रखरखाव समिति करती है। शिवरात्रि पर भव्य शिव बारात निकाली जाती है।  सावन माह में पूजा अर्चना करने वालों का तांता लगा रहता है।
विज्ञापन


कस्बे के मध्य ऊंचाई वाले इलाके में बना प्राचीन शिवालय शल्लेश्वर मंदिर का निर्माण व इतिहास आज तक उजागर नहीं हो सका है। चंदेलकालीन मंदिर व मठों की तर्ज पर पत्थर के शिलापटों से बने इस मंदिर को चंदेलकालीन माना जाता है।

मंदिर के गर्भ में भारी भरकम शिवलिंग स्थापित है। इस मंदिर के बारे में यह भी मान्यता है कि कस्बा प्राचीन काल में राजा शल्य की राजधानी रहा है। ऊंचाई वाले व मध्य क्षेत्र में यह मंदिर होने से लोग इसे राजा शल्य के महल का मंदिर भी बताते हैं। मंदिर के मुख्य द्वार पर एक शिलालेख लगा है, लेकिन अथक प्रयासों के बावजूद इसे पढ़ा नहीं जा सका है।
विज्ञापन


लोगों का दावा है कि मंदिर का शिवलिंग हर वर्ष एक चावल जितना लंबा व मोटा हो रहा है। इसकी प्रमाणिकता शिवरात्रि पर की जाती है। शिवरात्रि के मौके पर होने वाले शिव विवाह में शिवलिंग पर चढ़ने वाला जनेऊ हर वर्ष छोटा पड़ जाता है।

मंदिर का रखरखाव करने वाली श्री शल्लेश्वर मंदिर समिति ने इस मंदिर का नए लुक में भव्य निर्माण करा दिया है और अनवरत निर्माण कार्य जारी रहता है। शिवरात्रि के समय यहां शिव बारात का आयोजन करीब 42 वर्षों से होता आ रहा है।

साल भर यहां पूजा अर्चना व मनौती मांगने वालों का तांता लगा रहता है। सावन के महीने में दूर दराज से कांवरिये आकर जलाभिषेक करते हैं। पूरे वर्ष हर सोमवार को भजन-कीर्तन होता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें