मां के संघर्ष को याद कर हमीरपुर के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी डा.रामचंद्र
की आंखें डबडबा जाती हैं। वे कहते हैं कि उनका बचपन दो भाइयों और दो छोटी
बहनों के साथ तो हंसी खुशी से गुजरा, लेकिन आगे का जीवन बहुत संघर्षमय रहा।
पिता दिल्ली की एक कंपनी में कार्मिक थे, लेकिन कंपनी बंद हो गई तो गांव आ
गए। बड़ी मुश्किल से परिवार की जरूरतें पूरी हो पाती थीं। पिता की परेशानी
को देखकर मां फूलादेवी ने परिवार का जिम्मा अपने ऊपर उठा रखा था। उनका
परिश्रमी दृढ़ संकल्प हमें उत्साहित करता रहा। मां तमाम कष्टों के बीच
मेहनत मजदूरी कर हम सभी की परवरिश करती रहीं।
बीएसएस बताते हैं, पढ़ाई के
लिए मेरा चयन नवोदय विद्यालय में हो गया था। परिवार के अन्य लोगों ने मना
किया, लेकिन मेरी मां ने किसी की नहीं सुनीं और विद्यालय में भेज दिया,
बिना ये सोेचे कि महंगी पढ़ाई का खर्चा कैसे उठा पाएंगी। एक बार एक झूठी
शिकायत पर उनकी मां ने बहुत पिटाई की, लेकिन रात भर मेरे पास बैठी रोती
रहीं। हम बड़े हुए तो खर्चे भी बढ़े।
इसी बीच मां को क्षयरोग हो गया।
बावजूद इसके वह उनके हर खर्चे पूरे करने की जद्दोजहत में लगी रहती थीं।
पुरानी बातों को याद करते हुए वह जरा देर ठहरते हैं और फिर बोले, मां एक
बार इतनी बीमार हुई कि उनके बचने की उम्मीद नहीं थी। उस समय महंगी दवा के
लिए पैसों का अभाव था। अपनों की उपेक्षा ज्यादा पीड़ादायक थी।
मैंने चार
माह उनकी ऐसी सेवा की कि वह स्वस्थ हो गईं। इसके चलते उनका दुलार मेरे
प्रति और बढ़ गया। आज सभी भाई बहन सरकारी सेवा में कार्यरत हैं। इसे
दुर्भाग्य ही कहेंगे कि जिस दिन उन्होंने मुझे किसी लायक बनाया।
यानी मेरी
पहली ज्वाइनिंग थी, उसी दिन 22 मई 2002 को मां हमेशा के लिए हम सब को रोता
बिलखता छोड़कर इस दुनिया से चली गईं। मेरी मां ने हमेशा परिश्रम करने, किसी
काम को छोटा बड़ा न समझने की सीख दी है। आंखें बंदकर मैं आज भी उन्हें
भगवान से पहले याद करता हूं।