तमाम मुश्किलों के बावजूद बेटियां आसमान छूने में लगी हैं। इनका सपना अपने
मां बाप के सपने क ो पूरा करने के साथ ही अपनी माटी, अपने देश का नाम रोशन
करने का है। अब बेटियां पल भर में परेशान नहीं होती हैं बल्कि इसे चुनौती
और मौके के तौर पर लेती हैं। इनके अभिभावक भी इन्हें ऊर्जा देते रहते हैं।
क्योंकि समय के साथ-साथ अब अभिभावकों की सोच भी बदली है वे मानने लगे हैं
कि बेटियां भी बेटों से कम नहीं हैं। इनमें भी प्रतिभाएं हैं और साथ ही
समाज से कदम से कदम मिलाकर चलने की कुव्वत भी। अभिभावकों ने अपनी फूल सी
बच्चियों के लिए एक ही बात कही कि धूप की सुनहरी किरण सी होती हैं बेटियां,
आंगन में कोयल सी, चहचहाती हैं बेटियां। बिन बेटियों के सूना सा लगता है
ये आंगन, पुत्र घर की शान तो कुल की आन हैं बेटियां।’
लिंगानुपात में हुआ सुधार
बालिकाओं
को प्रोत्साहन देने के लिए प्रदेश सरकार ने कन्याविद्या धन, हमारी बेटी
उसका कल, बालिका आशीर्वाद जैसी योजना संचालित कर आगे बढ़ाने का काम किया
है। वहीं जिले में स्वास्थ्य विभाग का लंबा चौड़ा अमला लिंग अनुपात को
बराबरी में जुटा है। कन्या जन्मदर पर नजर डाली जाए तो जहां वर्ष 2013-14
में एक हजार बालकों पर 905 बालिकाएं थी। वहीं अब बढ़कर 914 पहुंच गई है।
अभिभावकों में आई जागरूकता
बच्चों
को कुपोषण से बचाने के लिए गांवों में आंगनबाड़ी केंद्र स्थापित है। इनके
जरिए पौष्टिक आहार वितरित कर उन्हें कुपोषण से बचाने के प्रयास जारी है।
साथ ही स्कूलों में मध्याह्न भोजन योजना संचालित कर बालक बालिकाओं को
स्कूलों में आने के लिए आकर्षित किया जाएगा। सरकारों की इस पहल से अभिभावक
भी जागरूक होने के साथ बालिकाओं को स्कूल भेजने से गुरेज नहीं कर रहे है।
उच्च शिक्षा में भी छात्रवृत्ति के साथ प्रतिपूर्ति शुल्क मिलने से भी
अभिभावक बालिकाओं को पढ़ाने से पीछे नहीं हट रहे है। जहां नगरीय क्षेत्रों
में बीते वर्ष स्नातकोत्तर में 1004 छात्राएं थी। वहीं ग्रामीण क्षेत्र की
सिर्फ 215 छात्राओं ने ही दाखिला लिया। तकनीकी शिक्षा का भी आंकड़ा कुछ इसी
तरह का है जहां ग्रामीण बालिकाएं अभी भी नहीं पहुंच पा रही है।
मिली को संगीत में महारत हासिल
हमीरपुर।
मुख्यालय निवासी अधिवक्ता सत्यप्रकाश गुप्ता की 10 वर्षीय पुत्री मिली
संगीत के क्षेत्र में ऊंचाई छू रही है। इस विधा के जरिए उसने जनपद के साथ
अपने माता पिता का नाम रोशन किया है। उसे पांच वर्ष की उम्र में ही संगीत
के प्रति रूचि पैदा हुई। तबसे लगातार वह विभिन्न कार्यक्रमों व आयोजनो में
अपनी आवाज के जरिए लोगों को मंत्रमुग्ध कर रही है। उनके गीत, गजल व भजनों
को लोगों की खूब वाहवाही व तालियां मिलती है। उसने कई प्रतियोगिताओं में
प्रतिभाग कर जिले का नाम रोशन किया है। अधिवक्ता सत्य प्रकाश ने बताया कि
बांदा में नटराज संगीत विद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में बुंदेलखंड के
सभी जनपदो के बच्चों ने हिस्सा लिया था। जिसमें उसने स्थान पाकर जिले का
नाम रोशन किया था।
मैराथन में रंजना ने गाड़ा झंडा
हमीरपुर।
गरीबी में पली बढ़ी रंजना आज किसी नाम की मोहताज नहीं है। अब तक एथलेटिक्स
के 25 नेशनल पुरस्कार जीत चुकी है। नगर क्षेत्र से सटे मेरापुर गांव
निवासी कंधीलाल खंगार की पुत्री रंजना सिंह खंगार जिले में एथलेटिक्स के
रूप में मशहूर है। दूध बेचकर जहां पिता परिवार का पालन पोषण कर रहा है।
वहीं बचपन से रंजना में दौड़ लगाने का जज्बा पैदा हुआ। जो आज भी उसे मैराथन
की ओर खींचता रहता है। उसका हाईस्कूल में पढ़ाई करने के साथ 2006 में
मैराथन खेलों में भाग लेने का सिलसिला शुरू किया वह आज भी जारी है। करीब 7
वर्षों के इस अंतराल में रंजना ने दो दर्जन से अधिक मैराथन दौड़ों में
जिला, मंडल, प्रदेश व देश स्तर के मेडल प्राप्त किया है। वह कहती है बीते
18 जनवरी को मुंबई में आयोजित इंटर नेशनल मैराथन में 10वां स्थान पाकर 50
हजार रुपये का पुरस्कार जीता है।