बुंदेलखंड में अन्ना प्रथा पर रोक लगाने के तमाम प्रयास जारी हैं, पशुपालन
विभाग ने इसके लिए बुंदेलखंड विशेष पैकेज से गांवों में चौपाल लगाई। इस पर
12 लाख रुपये खर्च किए गए । वहीं जिला स्तर पर होने वाली कृषि गोष्ठियों
में भी हर बार जानवर छोड़ने वालों पर कार्रवाई करने के लिए कहा जा रहा है।
लेकिन पशु पालक दूध दुहने के बाद जानवरों को खुला छोड़ रहे हैं। इससे यह
जानवर फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इससे जहां पशुओं की नस्ल खराब हो
रही है, वहीं दुग्ध उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है।
बुंदेलखंड में शुरू
से जानवरों को खुला छोड़ने की प्रथा चली आ रही है। पूर्व में शहरों में
रहने वाले लोग घरों पर जानवर बांधे रहते थे, लेकिन अब वह भी जानवरों को
खुला छोड़े देते हैं। यह छुट्टा जानवर लोगों के लिए मुसीबत बनते हैं।
शहरी
इलाकों में गाय, बैल सड़कों पर डेरा जमाए रहते हैं, जिससे आएदिन दुर्घटना
की संभावना रहती है। यही नहीं, मंडियों में भी इन जानवरों की धमाचौकड़ी
जारी रहती है।
वहीं ग्रामीण इलाकों में यह जानवर फसलों को नुकसान पहुंचाते
हैं। खुला छोड़ने से गाय, बैल, भैंस की नस्ल भी खराब होती है। पशुपालन
विभाग के अनुसार जिले में 269513 गाय, बैल व 199533 भैंस हैं।
एक जानकारी
के अनुसार भैंसों के अलावा अन्य जानवरों को खुला छोड़ दिया जाता है, जो
लोगों की परेशानी का सबब बनते हैं। अन्ना प्रथा (जानवरों को बिना बंधन के
रखना) उन्मूलन के लिए एक दशक से अधिक समय से अभियान चलाए जा रहे हैं।
विभिन्न ब्लॉकों में स्थित पशु चिकित्सालयों पर अन्ना प्रथा रोकने के लिए
पशुपालकों को ज्वार, मक्का के बीच भी नि:शुल्क देता है, ताकि वह पशुओं को
हरा चारा खिला सकें, लेकिन शासन की इस सोच पर पशुपालक पलीता लगा रहे हैं।
मुख्य विकास अधिकारी अवधेश बहादुर सिंह ने कहा कि अन्ना प्रथा की रोकथाम
को प्रयास किए जा रहे हैं। अन्ना प्रथा से पशुओं की नस्ल में गिरावट आ रही
है। डीएम ने अन्ना प्रथा पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं।
इसमें पुलिस की
भी मदद लेने की बात कही गई है। अन्ना प्रथा के खात्मे से ही किसान जायद और
खरीफ की फसल ले सकते हैं।