इस शोर में पढ़ना मुश्किल था सो वह वापस बैठ गए थे। निदा का ऐसा इस्तकबाल करने वाला वह कद्रदान कौन था, यह तो खैर बाद में भी पता नहीं चल पाया। इसके बाद हुए वाकये याद ज़रूर आ रहे हैं मगर आज ज़िक्र के काबिल नहीं हैं।
दोपहर को टेलीविज़न के मार्फत मिली खबर के बाद से सोशल मीडिया में बेशुमार श्रद्धांजलियां आई हैं, उनकी मशहूर ग़ज़लों के तमाम अशआर छपे हुए हैं, फिल्मों में इस्तेमाल हुई उनकी ग़ज़लों को सुनकर याद करने वाले भी बहुतेरे हैं। सच कहूं तो उदासी मुझ पर भी तारी रही है। इस उदासी और मुलाक़ात के कई वाकयों के बीच जगजीत सिंह की गाई ग़ज़ल का एक शेर स्मृतियों पर बार-बार सुपरइम्पोज़ हुआ है, ‘अपनी मर्जी से कहां अपने सफ़र के हम हैं/रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं’। वर्षों पहले मेरठ में हुए हादसों के बाद उनके शेर ‘ये नए मिजाज़ का शहर है..’ के जरिये बहुतों ने उन्हें पहली बार जाना। उनके कहन की सादगी और नाजुकी वाकई मुतासिर करती है। यह बात दीगर है कि ग़जलों-नज़्मों से ही उनकी शख्सियत और सोच का अंदाजा लगाने वाले उनके बारे में सचमुच कितना कम जानते हैं।
लम्बे समय तक बीबीसी हिन्दी के लिए वह एक कॉलम भी लिखते रहे- ‘अंदाज़े बयां’। अपने समय, समाज और साहित्य के साथ-साथ गुज़रे ज़माने पर उनकी ये टिप्पणियां रोचक ही नहीं हैं, पढ़ते हुए कई बार रोमांच भी पैदा करती हैं। उनका अंदाज़े बयां यह कि माज़ी के हवाले से आज के मसाइल के जवाब भी खोज लेते। ‘ग़ालिब और इज़ारबंद की गांठें’ शीर्षक वाली उनकी एक टिप्पणी आज फिर से पढ़ डाली। इसमें उन्होंने लिखा है, ‘इतिहास सिर्फ़ राजाओं और बादशाहों की हार-जीत का नहीं होता। इतिहास उन छोटी-बड़ी वस्तुओं से भी बनता है जो अपने समय से जुड़ी होती हैं और समय गुज़र जाने के बाद ख़ुद इतिहास बन जाती हैं।
ये बज़ाहिर मामूली चीज़ें बहुत ग़ैरमामूली होती हैं।’ यहां वह ग़ालिब म्यूज़ियम और उसमें रखे ग़ालिब के इज़ारबंद के हवाले से शुरू की गई बात क़बीर और नज़ीर पर पूरी करते हैं। ऐसे दौर में जब मंच पर पढ़ने के लिए दूसरे शहरों में जाने वाले ख़ुद पर पीएचडी करने वाले विद्यार्थियों को साथ लिए घूमते हों, अपनी अहमियत जताने के लिए उनका परिचय पहले ही देते हों, निदा ख़ामोशी से इंसानी जज़्बों को ज़बान देने, लोगों की ज़िंदगी की बेहतरी को अपनी ज़िम्मेदारी मानकर कर्म में जुटे रहे। उनके कृतित्व का बेहतर मूल्यांकन शायद समय ही कर पाएगा।