अली (72) बताते हैं कि उच्च वर्ग के लोगों की ओर से किए गए भेदभाव उन्हें याद नहीं हैं, लेकिन एक बार साथी शिक्षक ने उन पर सांप्रदायिक टिप्पणी की थी। लेकिन, उसके बाद उस शिक्षक ने भी टोपी पहनना शुरू कर दिया था।
अली ने बताया कि 1969 और 1971 में संस्कृत में बीए और एमए की दोनों परीक्षाओं में वे अव्वल थे। उन्होंने तत्कालीन विभागाध्यक्ष अतुल चंद्र बनर्जी के अधीन वैदिक और इस्लामी मिथकों के तुलनात्मक अध्ययन पर पीएचडी पूरी की, जिन्होंने उनकी नियुक्ति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अली 2010 में संस्कृत विभाग प्रमुख के रूप में सेवानिवृत्त हुए। वे सर्वोच्च विभागीय पद संभालने वाले एकमात्र मुस्लिम प्रोफेसर थे। उन्होंने फिरोज खान मामले को लेकर नाराजगी जताते हुए कहा कि हमारे समय में ऐसी चीजें कभी नहीं हुईं। मुस्लिम होने के बावजूद, मैंने संस्कृत में उत्कृष्टता हासिल की और ब्राह्मणों के दबदबे वाले विभाग का प्रमुख भी बना।
डीडीयू के संस्कृत विभाग के वर्तमान प्रमुख मुरली मनोहर पाठक अली पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि वे एक सज्जन और एक विद्वान व्यक्ति थे। वे इतने परिश्रमी थे कि विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दिनों में अपने घर महराजगंज से रोजाना 30 किमी से अधिक दूरी साइकिल से तय करते थे।