शहर के 14 साल पुराने वाटर पार्क नीर निकुंज के मामले में गोरखपुर विकास प्राधिकरण (जीडीए) को बड़ा झटका लगा है। पार्क के साझेदारों और प्राधिकरण के बीच हुए अनुबंध को निरस्त करने के जीडीए उपाध्यक्ष ए. दिनेश कुमार के आठ नवंबर के आदेश को ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद कर दिया है। हाईकोर्ट ने उपाध्यक्ष को फिर से इस मामले में वाटर पार्क के साझेदारों का पक्ष सुनने और उसके बाद ही कोई निर्णय करने का आदेश दिया है। उधर, प्राधिकरण ने अब साझेदारों को उनका पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी करने की तैयारी शुरू कर दी है।
जीडीए उपाध्यक्ष द्वारा पार्क का अनुबंध निरस्त करने के खिलाफ साझेदारों ने मेसर्स केआर एम्यूजमेंट एंड रिसोर्ट्स की तरफ से इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इसपर जस्टिस शशिकांत गुप्ता और जस्टिस पीयूष अग्रवाल ने छह दिसंबर को सुनवाई की। दो सदस्यीय पीठ ने जो फैसला सुनाया, उसे सोमवार को हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया। फैसले के मुताबिक वाटर पार्क के साझेदारों का पक्ष सुने बिना इस तरह की कार्रवाई को न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता है। इसलिए जीडीए उपाध्यक्ष के फैसले को निरस्त किया जाता है।
दरअसल, चंपा देवी पार्क में स्थित वाटर पार्क को लेकर प्राधिकरण और मेसर्स केआर एम्यूजमेंट एंड रिसोर्ट्स के बीच 28 अक्तूबर 2005 को करार हुआ था। इस करार से संबंधित पूरक करार 19 अक्तूबर 2007 को हुआ था। चंपा देवी पार्क को लेकर अनुबंध की शर्तों का साझेदारों द्वारा उल्लंघन करने का दावा करते हुए जीडीए उपाध्यक्ष ने दोनों करार को निरस्त कर दिया।
अनुबंध निरस्त करने के आदेश में कहा गया था कि पार्क जीडीए की संपत्ति है। इसका संचालन करने वालों का अस्तित्व सिर्फ कस्टोडियन के रूप में है। करार का मकसद पार्क का समुचित रखरखाव, वाटर पार्क एवं इन्वायरमेंटल पार्क को विकसित करना था। मगर अनुबंध की शर्तें तोड़कर वहां पांच विवाह घर संचालित किए जा रहे थे। अनुबंध में पार्क का एक एकड़ हिस्सा सार्वजनिक लोगों के लिए छोड़ने को कहा गया था। वहां पाथ-वे बनाना था। मगर उस हिस्से पर भी बाउंड्रीवाल करा लिया गया। सभी गेटों पर सिक्योरिटी गार्ड बैठा दिए गए जिससे आम आदमी पार्क के भीतर पहुंच ही नहीं पाता।