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एक दर्द जो आगे दवा हुई

Wed, 24 Jan 2018 01:43 AM IST
विवेक सिंह, अमर उजाला, गोरखपुर।
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खिलाड़ियों को दूध पिलाते वीरेंद्र पासवान। - फोटो : Amar Ujala
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ये कहानी उस एक दर्द की है, जो आगे दवा बन गई। जिस पीर के चलते एक खिलाड़ी ने हार मान ली, अब वह उसी तरह की तकलीफ से घिरे खिलाड़ियों के चेहरों पर मुस्कान बिखेर रहा है। हम बात कर रहे हैं साइकिलिंग में प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर चुके और अब दूध विक्रेता वीरेंद्र पासवान की। आर्थिक कमी से खेल छोड़ने को मजबूर हुए वीरेंद्र अब उभरते खिलाड़ियों को रोजाना नि:शुल्क दूध पिलाकर उनके सपनों को पंख दे रहे हैं। 

मुफलिसी के चलते किसी खिलाड़ी का कैरियर खत्म न हो इसे ही वीरेंद्र ने अपने जीवन का मकसद बना लिया है। वह प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को न केवल मुफ्त दूध देते हैं, बल्कि किट समेत प्रतियोगिता स्थल तक आने-जाने का खर्च भी जुटाते हैं। वर्ष 2000 से ही खिलाड़ियों को नि:शुल्क दूध पिला रहे वीरेंद्र अब भी रीजनल स्पोर्ट्स स्टेडियम में प्रैक्टिस करने के बाद घर वापसी के दौरान करीब 15 खिलाड़ी मुफ्त में दूध देते हैं।
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लक्ष्य: प्रतिभाएं मुफलिसी के चलते दम न तोड़ें
पादरी बाजार में 1995 सेदूध की दुकान चलाने वाले वीरेंद्र 25 साल पहले साइकिलिंग के क्षेत्र में देश का नाम रोशन करना चाहते थे। स्टेट लेवल की कई प्रतियोगिताओं में शामिल भी हुए। मगर पारिवारिक जिम्मेदारियों और आर्थिक संकट की वजह से अपने इस जुनून को पूरा नहीं कर सके। ये दर्द हमेशा ही वीरेंद्र को सालता था, वर्ष 2000 में उन्होंने तय किया कि वह आर्थिक संकट से जूझ रहे खिलाड़ियों की मदद करेंगे ताकि प्रतिभाएं सही मुकाम पर पहुंचने से पहले ही दम न तोड़ दें। 
 

छह साल से मिल रहा प्यार
वीरेंद्र चाचा के घर छह सालों से आना-जाना है। उन्होंने कई बार आर्थिक मदद की है। किसी भेदभाव के बिना वह हर खिलाड़ी को मुफ्त में दूध देते हैं। पटना में हुई हाफ मैराथन में कांस्य, दिल्ली हॉफ मैराथन में सिल्वर, जामनगर हॉफ मैराथन में सिल्वर, दो बार स्टेट लेवल क्रास कंट्री और 10 किलोमीटर रेस में कांस्य पदक जीतने का श्रेय उनके सहयोग को भी जाता है। 
- निक्की राय, एथलीट
 
बढ़ाते हैं मनोबल
खिलाड़ी होने की वजह से वो खिलाड़ियों की समस्याओं को अच्छे तरीके से समझते हैं। दो साल से सुुबह शाम दो लीटर दूध देने के साथ ही वो खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाते हैं। पिछले साल एथलेटिक्स में तीन पदक मिले हैं।
पूजा वर्मा, एथलीट

पनीर और खोवा भी मुफ्त में देते हैं
चाचा दूध के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर खिलाड़ी को पनीर और खोवा भी मुफ्त में मुहैया कराते हैं। रीजनल स्टेडियम में प्रेक्टिस करके लौटने के बाद उनके पास से एक लीटर दूध रोजाना घर ले जाता हूं।
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- शैलेंद्र सिंह, खिलाड़ी

साथ मनाते हैं जीत का जश्न 
किसी खिलाड़ी के पदक हासिल करने पर उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। खिलाड़ी के वापस लौटने पर उससे मिलने और उसका मुंह मिठा कराने के अंदाज से लगता है कि जैसे पदक उन्हें ही मिला हो। ऐसा खेलप्रेमी मैंने कहीं ना देखा और ना ही सुना है।
- प्रतिभा कन्नौजिया, खिलाड़ी
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