आधुनिकता की दौड़ में हमने हरियाली रौंद डाली। इस होड़ में पर्यावरण को हो रहे नुकसान को भी हम भूल गए। उन वृक्षों पर आरा चला डाला, जिन्हें हमारे पुरनियों ने पूजा था। विकास की इस विनाशलीला के बाद भी शहर की पुरानी जेल में हमारे पुरखों के पर्यावरण प्रेम की एक निशानी बाकी है। पीढ़ियों पहले यहां जश्न मना था। दो दरख्तों की शादी में हमारे बुजर्ग घराती-बराती थे। आज भी इन दरख्तों की हरियाली पर्यावरण के प्रति हमारे पुरखों की जागरूकता का प्रमाण दे रही है। विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर हम आपको शहर की आब-ओ-हवा में अमृत घोल रहे इस अनोखे दंपती से मिला रहे हैं।
पुरानी जेल में पाकड़ का जोड़ा है। हरे-भरे इन विशालकाय दरख्तों में से एक के नीचे चारपाई लगाए बैठे 67 वर्षीय लाला प्रसाद ने दादा-बाबा से इनकी शादी का किस्सा सुन रखा है। उन्होंने बताया कि उनकी ही बुजुर्गों की जबानी यह कहानी यहां के बच्चे-बडे़ सभी जानते हैं। हालांकि, पेड़ों का ब्याह कब हुआ था, इस बारे में यहां का कोई भी शख्स ठीक से नहीं बता पाता। लाला प्रसाद की मानें तो यह उनके होश संभालने से पहले का वाकया है।
अमरचंद बताते हैं कि इन दोनों पेड़ों में जो सबसे विशाल है उसे हमारे बुजुर्गों ने ‘नर’ और उसके पास स्थित दूसरे पेड़ को ‘मादा’ बताया था। ‘नर’ पाकड़ पर ही 1857 में 300 क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। अजीत और गायत्री बताते हैं कि जब कभी गर्मी से परेशान होते हैं तो इस अनोखे दंपती की छांव में जा बैठते हैं। जितेंद्र कुमार बताते हैं कि धूमधाम से इन वृक्षों की शादी और लोगों की दावत की कहानी उन्होंने बुजुर्गों से सुन रखी है, लेकिन शादी कब हुई थी, पता नहीं।
1952 तक यहां रहते थे कैदी
पुरानी जेल में अंग्रेजों ने मगध से लाए डोमों को कैद कर रखा था। इनसे वो अपने कामकाज कराते थे। देश को 1947 में आजादी मिली लेकिन ये बेचारे आजाद नहीं हो सके। इसकी वजह अंग्रेजी शासन का एक कानून था। 1952 में इन्हें इस एक्ट से आजादी मिली। हालांकि, पीढ़ियों से कैद रहे ये परिवार इसके बाद भी यहां से नहीं गए। ऐसे में यहां रहने वाले लोगों ने संभावना जताई कि दरख्तों की शादी एक्ट से आजादी मिलने की मन्नत पूरी होने पर बुजुर्गों ने कराई होगी।
पेड़ों के साथ आस्था से जुड़ा है कुआं
पुरानी जेल के बाशिंदों में दोनों पेड़ों को लेकर जैसी आस्था है वैसा ही इन वृक्षों से चंद कदमों के फासले पर स्थित कुएं को लेकर भी है। जितेंद्र और अमर चंद ने बताया कि बुजुर्गों से सुनते आए हैं इसी कुएं पर प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी ‘बंधू सिंह बाबा’ की फांसी हुई थी। कुआं काफी गहरा है। इसमें करीब 20 लोग कूद चुके हैं, लेकिन आज तक किसी की मौत नहीं हुई। ये कुआं वर्षा के दौरान भूगर्भ जल स्तर को चार्ज करता है और हमेशा इसका जलस्तर एक सा होता है।