गोरखपुर यूनिवर्सिटी के दर्शन शास्त्र विभाग में भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद नई दिल्ली द्वारा ‘बौद्ध दर्शन में सिद्धांत एवं प्रयोग के समन्वय का पूर्ण दर्शन’ विषयक व्याख्यान का आयोजन किया गया। इसमें मुख्य वक्ता प्रो. हाइयान शेन ने चीन में प्रचलित विभिन्न बौद्ध दर्शन को चीनी दार्शनिक जीवी के दर्शन से बयां किया।
प्रो. शेन ने बताया कि चीन में बौद्ध दर्शन का पहला सिद्धांत चीनी दार्शनिक जीवी ने टेनटाई स्कूल में दिया था। इसके बाद में चीन में विभिन्न प्रकार के बौद्ध दर्शन प्रचलन में आ गए। हालांकि सबका सार भगवान बुद्ध के सिद्धांतों पर ही आधारित है। यह तभी सफल हो पाता है जब सिद्धांत और सिद्धांत के प्रयोग में समन्वय रहता है। इसके अलावा अपने साथ समाज के निर्वाण के लिए प्रयास करना चाहिए। भगवान बुद्ध भी जीवन पर्यंत इसी का पालन करते रहे। भारतीय परंपरा भी इसी दर्शन पर काम करती है। अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. अशोक कुमार और विशिष्ट अतिथि दर्शनशास्त्र के पूर्व अध्यक्ष एवं पूर्व उपकुलपति प्रो. सभाजीत मिश्र ने भी व्याख्यान दिया। संचालन एसके तिवारी और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. दीपनारायण यादव ने दिया। इस मौके पर भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद की निदेशक पूजा व्यास, प्रो. चितरंजन मिश्र, प्रो. आरपी शुक्ला, प्रो. रामप्रकाश, प्रो. कमलेश शुक्ला समेत कई शिक्षक एवं विद्यार्थी मौजूद थे।
संघर्ष के दौर से गुजर रहा है बुद्धिज्म : प्रो. हाइयान
प्रो. हाइयान शेन ने कहा कि बुद्धिज्म अभी संघर्ष के दौर से गुजर रहा है। जहां समाज के पिछड़े लोग बुद्ध को भगवान के रूप में पूजते हैं वहीं पढ़ा-लिखा तबका अब भी इससे दूर है। दार्शनिक मार्क्स ने कहा था कि धर्म लोगों के लिए अफीम की तरह है। चीन में बौद्ध दर्शन कुछ इसी तरह का हो गया है। फिर भी काफी संख्या में लोग अभी इस दर्शन से दूर हैं। ऐसे में चीनी सरकार भी बौद्धिज्म को बढ़ावा दे रही है।
प्रो. हाइयान को भा गई रंगोली
सेमिनार में आवभगत से प्रो. हाइयान अभिभूत हो गईं। कहा कि परंपरागत तरीके से किया गया स्वागत देश की संस्कृति को बयां करता है। रंगोली, माल्यार्पण, सरस्वती वंदना, दीप प्रज्ज्वलन आदि की वह कायल हो गईं। प्रो. शेन विश्व के कई विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर के तौर में काम कर चुकी हैं। भारत की यात्रा के दौरान उनका व्याख्यान गोरखपुर यूनिवर्सिटी समेत कई प्रमुख बौद्ध स्थलों वाले शहरों में होगा। इनमें सारनाथ, बोधगया, मगध विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय भी शामिल है। गोरखपुर, भगवान बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी, राजमहल कपिलवस्तु और महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर से सीधे जुड़ा है, लिहाजा इस कड़ी का पहला व्याख्यान गोरखपुर यूनिवर्सिटी में आयोजित किया गया।