मस्जिद में नमाज पढ़ते रोजेदार।
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माह-ए-रमजान के दूसरे जुमा की नमाज शहर की छोटी बड़ी तमाम मस्जिदों में अदा की गई। फ र्ज नमाजों के साथ कसरत से नफ ील नमाज अदा की गई। तिलावतें कलाम पाक किया गया। तस्बीह हुई। पूरा जुमा रब को राजी करने में गुजरा।
शुक्रवार के भोर में रोजेदारों ने सहरी खाई। पुरुषों ने मस्जिदों में तो महिलाओं ने घरों में नमाज अदा की। इसके बाद कुरआन शरीफ की तिलावत की गई और जुमा की नमाज की तैयारी शुरू हो गई। जुमा की अजान होने तक मस्जिदें नमाजियों से भर गई। इसके बाद नमाजियों ने सुन्नतें अदा की। इमाम ने तकरीर पेश की। मस्जिदों के इमाम ने खुदा की हम्द व सना बयान की। इमाम के साथ सभी ने खुदा के बारगाह में दुआ के लिए हाथ उठाए। इमाम की दुआ पर सभी ने आमीन की सदाएं बुलंद की। पुरुषों ने भी घर आकर तिलावत व तस्बीह की।
इसके बाद इफ्तारी की तैयारी शुरू हो गई। शाम को असर की नमाज पढ़ी गई। इसके बाद इफ्तारी मुकम्मल हो जाने पर मस्जिदों व पास पड़ोस के घरों में भेजवाई गई। मस्जिद का डंका जैसे ही बजा, सबने खुदा का शुक्र अदा करते हुए रोजा खोला। इसके बाद मस्जिदों का रुख किया। मगरिब की नमाज अदा की, फि र थोड़ा चाय नाश्ता किया। इसके बाद ऐशा, तरावीह व वित्र की नमाज अदा की। लोगों ने खुदा की रजा में बिताई। खुदा से अपने गुनाहों की माफ ी मांगी।
रोजा बीमारियों को दूर करता है : मुफ्ती अख्तर
मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया दीवान बाजार के मुफ्ती अख्तर हुसैन ने कहा कि रोजा रखने में बहुत सी हिकमतें हैं। रोजा रखने से भूख और प्यास की तकलीफ का पता चलता है। इससे खाने-पीने की चीजों की अहमियत के बारे में वाकिफ होते हैं। इंसान खुदा का शुक्र अदा करता है। रोजा से भूख और प्यास पर मेहरबानी का जज्बा पैदा होता है, क्योंकि मालदार अपनी भूख याद करके गरीब मोहताज की भूख का पता लगाते हैं। रोजा से भूख बर्दाश्त करने की आदत भी पड़ती है। अगर कभी खाना मयस्सर न हो तो इंसान घबराता नहीं है। भूख बहुत सी बीमारियों का इलाज है। उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर अन्य महीनों में और खास तौर पर रमजान माह में फ कीर व अन्य मांगने वालों को न झिड़कें। गरीबों, जरूरतमंदों की मदद करें। अगर मौका मिले तो उनको इफ्तार और खाने में शरीक करें और सवाब हासिल करें।