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दिल का दौरा पड़ने से प्रो. सतीश मित्तल का निधन

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दिल का दौरा पड़ने से प्रो. सतीश मित्तल का निधन
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गोरखपुर। अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. सतीश चंद मित्तल (81) का गुरुवार की रात करीब साढ़े आठ बजे दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह होटल पार्क रीजेंसी में ठहरे थे। दिल का दौरा पड़ने के बाद आनन फानन में गुरु गोरक्षनाथ चिकित्सालय ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। प्रो. मित्तल मूल रूप से सहारनपुर के रहने वाले थे।
प्रो. सतीश गोरखनाथ मंदिर में आयोजित संगोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता भाग लेने आए थे। कार्यक्रम में शिरकत करने के बाद होटल गए थे, जहां दिल का दौरा पड़ गया। उनके निधन की सूचना मिलते ही साहित्य जगत में शोक की लहर छा गई है। गोरखपुर विश्वविद्यालय में शुक्रवार से होने वाली दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी स्थगित कर दी गई। संगोष्ठी के संयोजक प्रो हिमांशु चतुर्वेदी ने बताया कि शुक्रवार को सुबह 10.30 बजे संवाद भवन में शोकसभा होगी। प्रो. मित्तल का शव गुरु गोरक्षनाथ चिकित्सालय की एंबुलेंस से दिल्ली भेजा गया है। उनके परिवार के सदस्य दिल्ली मेें हैं।
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आधुनिक भारत के इतिहास के सशक्त हस्ताक्षर प्रो सतीश चंद मित्तल पहले भी गोरखपुर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के कार्यक्रमों में शरीक हो चुके हैं। शुक्रवार को भी उन्हें बतौर विशिष्ट अतिथि शामिल होना था। संगोष्ठी के संयोजक प्रो हिमांशु चतुर्वेदी ने बताया कि सहारनपुर के मूलत: निवासी प्रो मित्तल कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के आचार्य रहे हैं। उनकी 54 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। हाल ही में उन्होंने पश्चिमी राष्ट्रीयता को नकारते हुए भारत की राष्ट्रीयता से जोड़ने का काम किया था। वहीं, गोरखनाथ मंदिर के कार्यक्रम के कर्ताधर्ता डॉ. प्रदीव राव ने कहा कि वह होटल में थे, तभी दिल का दौरा पड़ गया।
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संत गंगा जल की निर्मल: प्रो. सतीश
- गोरक्षपीठाधीश्वर व मुख्यमंत्री की मौजूदगी में हुआ था अंतिम संबोधन
गोरखपुर। अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. सतीश चंद मित्तल का अंतिम संबोधन बृहस्पतिवार को गोरक्षपीठाधीश्वर व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में हुआ था। गोरखनाथ मंदिर की संगोष्ठी में हिस्सा लेने आए प्रो. सतीश चंद्र मित्तल ने कहा था कि हम आध्यात्मिक होने के साथ ही जीवंत राष्ट्र हैं। इस देश को विश्व गुरु बनाने में संत समाज ने अद्भुत योगदान दिया, इसलिए इस देश की सांस्कृतिक और परंपरा सदैव जीवंत रही। भारतीय परंपरा विश्वबंधुत्व और वसुधैव कुटुम्बकम की है। हम विश्व को अपना परिवार मानते हैं। जाति, धर्म, पंथ में कभी उलझते नहीं। संत जलों में गंगा जल की तरह निर्मल होता है। उनके त्याग और तपस्या से देश यहां पहुंचा है। महंत दिग्विजयनाथ और महंग अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि पर आयोजित श्रद्धांजलि समारोह के तहत आयोजित ‘राष्ट्रीय पुनर्जागरण यज्ञ एवं संत समाज’ विषयक संगोष्ठी में प्रो. सतीश ने कहा था कि पाश्चात्य संस्कृति खाओ पियो-मस्त रहो की परंपरा में विश्वास करती है, वहीं भारतीय संत परंपरा जियो और जीने दो में। संतों ने धर्म के साथ ज्ञान-विज्ञान की भी बात की। संत पर पीड़ा को समझता है इसलिए वह समरस समाज की स्थापना के लिए तत्पर रहता है। महाराणा प्रताप और शिवाजी अपने गुरुओं से प्रेरणा लेकर राष्ट्र के प्रति समर्पित रहे। संतों ने हर क्षेत्र में हमारा मार्गदर्शन किया।
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