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‘रेट’ का इंतजार कर रहे सैकड़ों मेधावी

Mon, 25 Apr 2016 01:50 AM IST
डॉ. राकेश राय, अमर उजाला, गोरखपुर।
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गोरखपुर यूनिवर्सिटी
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शोध की गुणवत्ता बढ़ाने की कवायद यूं तो गोरखपुर यूनिवर्सिटी में आए दिन देखने को मिलती है। यूनिवर्सिटी के स्टाफ एकेडमिक कालेज ने पिछले सत्र में इसे लेकर कई संगोष्ठियां भी आयोजित कीं, लेकिन शोध की गुणवत्ता को लेकर यूनिवर्सिटी कितनी संजीदा है, इसकी एक बानगी यह भी है कि 2013 के बाद से यहां शोध पात्रता परीक्षा यानी ‘रेट’ का आयोजन ही नहीं हुआ। यूनिवर्सिटी के ज्यादातर विभागों में शोध की सीटें खाली पड़ी हैं और पूर्वांचल की मेधा शोध के लिए भटक रही है।
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यूनिवर्सिटी में शोध के लिए यूजीसी ‘नेट’ की बाध्यता के बाद से जब विभागों में शोधार्थियों की कमी हुई तो विकल्प के तौर पर हर यूनिवर्सिटी में शोध पात्रता परीक्षा का विकल्प अपनाया गया। इसी क्रम में गोरखपुर यूनिवर्सिटी में पहली बार 2006 में ‘रेट’ का आयोजन हुआ। उसमें चुने गए कई ऐसे विद्यार्थियों को शोध का अवसर मिला जो किसी वजह से ‘नेट’ पास नहीं कर सके लेकिन शोध की इच्छा और योग्यता दोनों रखते थे।

इसी क्रम में 2010 और फिर 2013 में यूनिवर्सिटी ने ‘रेट’ आयोजित किया और ऐसे ही मेधावियों को शोध का अवसर दिया, लेकिन उसके बाद से यह सिलसिला थम गया। इसके चलते उन विषयों में शोध की सीटें खाली पड़ी हैं, जिनमें ‘नेट’ क्वालिफाई विद्यार्थियों की तादाद कम है। इन विषयों में खासकर अर्थशास्त्र, कामर्स, गृह विज्ञान और विज्ञान वर्ग के करीब-करीब सभी विषय शामिल हैं।  इसलिए जरूरी है ‘रेट’ का आयोजन पूर्वांचल में ‘रेट’ की जरूरत कई वजहों से है। पहली तो ये कि कई विषयों के कोर्स ‘नेट’ के कोर्स से पूरी तौर पर मेल नहीं खाते, जिस वजह से यूनिवर्सिटी के कई विद्यार्थी योग्यता रखते हुए भी शोध से वंचित रह जाते हैं। इसके अलावा कई बार कुछ विद्यार्थी शोध विषय का ज्ञान तो रखते हैं लेकिन ‘नेट’ न होने से उस स्थिति में ही नहीं पहुंच पाते कि वे अपने ज्ञान का इस्तेमाल शोध में कर सकें। ‘रेट’ ऐसी स्थानीय प्रतिभाओं को अवसर देने का माध्यम है। 
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कई विषयों में शोध की सीटें खाली होने की जानकारी मिली है। ऐसे में ‘रेट’ का आयोजन जरूरी है। परास्नातक परीक्षाओं की सेमेस्टर परीक्षाओं के संपन्न कराने के बाद इसे लेेकर प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। अगले सत्र की शुरुआत में इस परीक्षा को आयोजित करने की योजना है।
- प्रो. अशोक कुमार, कुलपति, गोरखपुर यूनिवर्सिटी 

‘रेट’ से शोध में हो जाती आसानी
शोध की मंशा के साथ गृह विज्ञान से एमए किया था लेकिन ‘नेट’ न हो पाने से यह इच्छा फिलहाल दबी हुई है। ‘नेट’ के लिए प्रयास चल रहा है लेकिन ‘रेट’ होता था तो यह इच्छा पूरी करने में आसानी होती। 
- अन्विता राय, दाउदपुर

तीन साल से इंतजार कर रहा हूं
दुर्भाग्यवश 2013 में होने वाली परीक्षा में मैं शामिल नहीं हो सका। तभी से ‘रेट’ का बेसब्री से इंतजार है। फिलहाल ‘नेट’ तो दे ही रहा हूं यदि ‘रेट’ हो जाता तो कम से कम शोध में पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती। 
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- सर्वेश सिंह, शिवपुर शाहबाजगंज
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