शिब्बनलाल शुरू से ही स्वराज आंदोलन से काफी प्रभावित थे जिसकी वजह से वह हमेशा ही लोगों की नजरों में चढ़े रहे। विश्वविद्यालय में एक बार किसी उत्सव में भाग लेने पहुंचे शिब्बनलाल ने शेरवानी पहना था जिसे देखकर प्राचार्य ने उन्हे देशी पहनावा पहनने के लिये टोक दिया। शिब्बनलाल ने उसी समय से अंग्रेजी वेश-भूषा को त्यागने का प्रण किया आजीवन धोती और कुर्ता ही पहनते रहे। शिब्बनलाल पढ़ाई के साथ-साथ खेलों को भी पूरा महत्व देते थे और यह मानते थे कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का विकास होता है। वे पहलवानी करते थे और विश्वविद्यालय में फुटबाल टीम के कप्तान थे।
13 साल की उम्र में विरोध जुलूस का नेतृत्व किए
वर्ष 1919 में हुए जलियावाला कांड ने जब पूरे भारत को हिला कर रख दिया तब कानपुर में शिब्बनलाल ने भी 13 वर्ष की उम्र में एक विरोध जुलूस का नेतृत्व किया और पकड़े गये। उस समय उन्हे तीन बेतों की सजा मिली उनका विश्वास और भी मजबूत बना दिया और आजादी के लिये लड़ी जा रही लड़ाई में अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिये प्रेरित किया।
एक लाख पच्चीस हजार किसानों को मिला हक
1937 से लेकर 1940 तक शिब्बनलाल ने विभिन्न किसान आन्दोलनो से अंग्रेज सरकार की नाक में दम कर दिया जिसकी वजह से सरकार को जमीनों का एक बार फिर से सर्वे कराना पड़ा और जमीनों का पुनः आबंटन करना पड़ा। यह वही व्यवस्था थी जिसकी वजह से तत्कालीन महराजगंज के एक लाख पच्चीस हजार किसानों को उनकी जमीनों पर मालिकाना हक प्राप्त हुआ। अखबारों ने शिब्बनलाल को 'पूर्वी उत्तर प्रदेश का लेनिन' कहकर संबोधित किया था। किसानों की जमीनों पर मालिकाना हक की इस व्यवस्था को 'गण्डेविया बंदोबस्त' कहते हैं। 13 मार्च 1965 में उन्होने जवाहर लाल नेहरू पोस्ट ग्रेजुएट कालेज महराजगंज आरम्भ किया।