प्रसव के बाद प्रसूताओं को डिस्चार्ज करने में जल्दबाजी इनकी जिंदगी को जोखिम में डाल रही है। जिले में प्रसूताओं की होने वाली मौतों में से 50 फीसदी मौतें हाई पोस्टपार्टम हैमरेज (अधिक रक्तस्राव) से हो रही हैं। जिसकी प्रमुख वजह इनका अस्पताल में 48 घंटे न रुकना है। यह बात स्वास्थ्य विभाग की मातृ मृत्यु दर की ऑडिट में सामने आई है। अब इसके लिए विभाग 5 फरवरी को हाई रिस्क प्रेगनेंसी डे मनाने जा रहा है।
स्वास्थ्य विभाग ने प्रसूताओं की मौतों को गंभीरता से लिया है। बीते साल हुए 119 मौत में से 93 मौतों की ऑडिट में यह पूरी तरह से साफ हो चुका है कि ज्यादातर मौतों की वजह प्रसव के 24 घंटे के भीतर अत्यधिक रक्तस्राव होना है। इस बीच यदि प्रसूता अस्पताल में रहती है तो उसे तत्काल उपचार देकर बचाया जा सकता है।
इसे रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग अब 5 फरवरी को हाई रिस्क प्रेगनेंसी डे मनाएगा और इसी दिन से गर्भवतियों की जांच शुरू की जाएगी। प्रशिक्षित एएनएम के जरिए जांच कराकर हाई रिस्क के दायरे में आने वाली गर्भवतियों को एफआरयू (फर्स्ट रेफरल यूनिट) पर प्रसव कराने पर जोर दिया जाएगा। हाई रिस्क के दायरे मे वे गर्भवती आएंगी, जिनका हीमोग्लोबिन सात प्रतिशत हो, पहला बच्चा ऑपरेशन से हुआ हो, गर्भ में भ्रूण जुड़वा हो, गर्भवती को हृदय से संबंधित कोई रोग हो या डायबिटीज हो।
ऐसी गर्भवतियों का प्रसव एफआरयू में कराने पर जोर दिया जाएगा। शहर में तीन एफआरयू है। जिला महिला अस्पताल, पिपराइच सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और सहजनवां स्वास्थ्य केंद्र। एडिशनल सीएमओ डॉ. नंद कुमार ने बताया कि मातृ मृत्यु दर की रोकथाम के लिए स्वास्थ्य महकमा ने यह योजना बनाई है। 5 फरवरी से इसपर काम तेज हो जाएगा।