प्रदूषण फैलाने में 150 ईंट-भट्ठा संचालकों को नोटिस
गोरखपुर। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से प्रदूषण संबंधी प्रमाणपत्र लिए बिना ही गोरखपुर जिले में चल रहे करीब 150 ईंट-भट्ठा संचालकों को बोर्ड ने नोटिस भेजकर जवाब मांगा है। सकारात्मक जवाब नहीं मिला तो इन ईंट-भट्ठों को बंद कराया जाएगा। वहीं, जिले में कई ऐसे ईंट भट्ठे भी हैं जो अवैध ढंग से चलाए जा रहे हैं। इनके खिलाफ भी अभियान चलाने की तैयारी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कर ली है। जिले में करीब 400 ईंट-भट्ठे हैं।
ईंट भट्ठों के संचालन के लिए पानी के साथ वायु प्रदूषण संबंधी प्रमाणपत्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से लेना अनिवार्य होता है। वहीं नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के नियमानुसार सभी ईंट भट्ठों को भट्ठा बनाने के दौरान ग्रेविटी सेटलिंग चैंबर बनाना होता है। साथ ही चिमनी की न्यूनतम ऊंचाई भी 27 मीटर होनी जरूरी होती है। ये दोनाें ही मानक पूरे करने के बाद इसका प्रमाणपत्र ईंट भट्ठा संचालकों को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से लेना होता है। लेकिन जिले के अधिकांश ईंट भट्ठा संचालकों ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अब तक प्रमाणपत्र नहीं लिया है। ऐसे में बोर्ड ने अब ऐसे भट्ठों पर कार्रवाई शुरू कर दी है।
- ईंट भट्ठा संचालकों को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से वायु प्रदूषण संबंधी प्रमाणपत्र लेना जरूरी है। करीब 150 ईंट भट्ठा संचालकों ने अब तक यह प्रमाणपत्र नहीं लिया है। ऐसे में इन सभी को प्रदूषण संबंधी प्रमाणपत्र लेने के लिए नोटिस भेजा गया है। दिसंबर तक सभी को प्रमाणपत्र लेना होगा। इसके बाद कार्रवाई शुरू होगी।
- पंकज यादव, क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी
वायु प्रदूषण को रोकने के लिए ग्रेविटी सेटलिंग चैंबर का प्रावधान
ईंट भट्ठा में जब कोयला जलाया जाता है तो इसके कण चिमनी से होते हुए खुले वातावरण तक पहुंच जाते हैं। इसको रोकने के लिए सभी ईंट भट्ठों में ग्रेविटी सेटलिंग चैंबर लगाया जाता है। कोयले के कण जलने के बाद इसी चैंबर में एकत्र होते हैं और प्रदूषण नहीं फैलता है। वहीं चिमनियों को कम से कम 27 मीटर ऊंचा बनाया जाता है।
ठंड के मौसम में ईंट भट्ठा संचालन पर एनजीटी की है रोक
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने ठंड के मौसम में सभी ईंट भट्टों को चलाने पर रोक लगा रखी है। इसके लिए बाकायदा उसने नियम बनाया हुआ है। इसकी वजह है कि ठंड में हवा में काफी नमी होती है, जिसकी वजह से धूल और धुएं के कण ऊपर नहीं उठ पाते हैं। इससे सांस के रोगियों को तो दिक्कत होती ही है बल्कि आम आदमी को भी काफी परेशानी होती है। कुछ इसी तरह की दिक्कतों की वजह से एनजीटी ने पराली के जलाने पर भी रोक लगा रखी है। गोरखपुर ईंट निर्माता समिति के महामंत्री अर्जुन कुमार बालानी ने कहा कि समिति से जुड़े सभी ईंट निर्माताओं ने नियम को ध्यान में रखते हुए ठंड के मौसम में ईंट का उत्पादन बंद रखने का निर्णय लिया है। हालांकि कई ईंट भट्ठा संचालक इसका उल्लंघन भी करते हैं।
जिग-जैग चैंबर वाले ईंट भट्ठों से नाम मात्र का होता है प्रदूषण
अर्जुन कुमार बालानी ने बताया कि जिले के कई ईंट भट्ठा संचालकों ने ग्रेविटी सेटलिंग चैंबर की बजाए जिग-जैग चैंबर पद्धति अपना ली है। दरअसल इस तकनीक में चिमनी के अंदर ईंटें आड़ी-तिरछी रखी जाती हैं। साथ ही बेहतर क्वालिटी के कोयले का भी इस्तेमाल होने लगा है। इसकी वजह से इस तकनीक से बने ईंट भट्ठों से धुआं न के बराबर निकलता है। और अगर निकलता भी है तो उसका रंग काले की बजाए सफेद होता है।