अपनी ख़ास कहन के लिए पहचाने जाने वाले हर दिल अजीज शायर निदा फाज़ली इतवार को शहर में थे। उन्हें पढ़ने-सुनने वाले उनके कहन की नाज़ुकी और गहरे सरोकार से खूब वाकिफ हैं। वह फिल्मों के लिए लिख रहे हों या किसी पत्रिका में, हर अशआर पर उनके दस्तखत अलग मालूम होते हैं।
सवाल : गुजरे वर्षों में मुशायरे के मंच और सुनने वालों के मयार में किस किस्म की तब्दीली महसूस करते हैं?
जवाब : पहले मंच और साहित्य एक ही थे। ऐसे में मयार पर चर्चा ही बेमानी थी लेकिन जब से इन दोनों में फर्क आया तो बदलाव लाजिमी है। दरअसल पहले सुनाने वालों और सुनने वालों दोनों समझ के तल पर बराबर होते थे। गालिब पढ़ते थे तो मोमिन सुनते थे, मोमिन पढ़ते तो गालिब। मगर अब तो ऐसी उम्मीद भी नहीं कर सकते।
सवाल : कद्रदानों के लिहाज से मंच और साहित्य में क्या फर्क?
जवाब : बहुत से ऐसे शायर और कवि हैं, जो लाइब्रेरी का हिस्सा तो हैं मगर मंच का नहीं। मंगलेश डबराल, अरुण कमल, मोहम्मद अल्वी, धर्मवीर भारती, सर्वेश्वर और शमशेर सरीखे लोग मंच पर नहीं दिखे लेकिन उनको पढ़ने और समझने वालों की कोई कमी नहीं।
सवाल : नई पीढ़ी के लोगों के काम पर आपकी राय ?
जवाब : दिक्कत यह है कि आज की शायरी तीन चौथाई लोगों की समझ से गायब है। इसके लिए सिर्फ भाषा ही जिम्मेदार है। सीधी सी बात है कि शायरी की भाषा आम आदमी की हो, जिसे सुन श्रोताओं में बगदाद के मुंतजर अल जैदी सी विरोध की शक्ति पैदा हो, जिसने जूते में गुस्सा भर दिया। लेकिन यह गुजारिश भी है कि शायरी को बाजार न बनने दें।
सवाल : पुरस्कार या इसे लेकर होने वाले विवाद-बहसें कितनी अहम् हैं?
जवाब : साहित्यकारों और सेना के जवानों को पुरस्कार तब दिए जाते हैं, जब वे पुरस्कार पाने की वजहें तक भूल गए होते हैं। मुल्कराज आनंद ने जवानी के दिनों में ‘कुली’ लिखा और इसके लिए पुरस्कार उन्हें तब मिला जब वे जवानी को भूल चुके थे। मेरी समझ में नहीं आता कि इन पुरस्कार देने वालों को आखिर फिल्म स्टारों और खिलाड़ियों की प्रतिभा समय से कैसे दिख जाती और साहित्यकारों की सृजनशीलता इतनी देर से क्यों समझ आती है? मैं यही कहना चाहूंगा कि क्रिकेट, नेता, एक्टर हर महफिल की शान, रद्दी में तुलने लगा है गालिब का दीवान।