गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत योगी आदित्यनाथ ने कहा कि भारत की ऋषि परंपरा ने राष्ट्र धर्म को सभी धर्मों से बड़ा माना है। भारत में संतों की परंपरा बहुत समृद्धशाली और प्राचीन है। अपनी आध्यात्मिक चेतना से संत समाज ने राष्ट्र को जागृत अवस्था में लाने का सदैव प्रयास किया।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस का मूलमंत्र लेकर स्वामी विवेकानंद ने जिस 11 सितंबर को दुनिया को आध्यात्म का संदेश दिया उसी 11 सितंबर को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमला हुआ।
योगी आदित्यनाथ गोरखनाथ मंदिर में महंत दिग्विजयनाथ एवं अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि पर आयोजित ‘राष्ट्रीय पुनर्जागरण यज्ञ एवं संत समाज’ विषयक गोष्ठी में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि मठ-मंदिरों को केवल पूजा-पाठ तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें लोक कल्याणकारी कार्यों के साथ राष्ट्र के कार्यों में आगे रहना चाहिए।
संतों की परंपरा न केवल मनुष्यों के लिए अपितु जीव मात्र के लिए मार्ग प्रशस्त करती है।
उन्होंने महर्षि विश्वामित्र व वशिष्ट का जिक्र करते हुए कहा कि जब रावण आर्याव्रत को नष्ट करने की तैयारी कर रहा था तब उस समय जनकपुर और अयोध्या को इसकी चिंता नहीं थी। तब इसकी चिंता विश्वामित्र ने की और उन्होंने दोनों राष्ट्रों को एक करने की दिशा में कार्य शुरू किया। यज्ञ के बहाने राम-लक्ष्मण को लेकर राष्ट्र रक्षा का कार्य किया।
शंकराचार्य को याद करते हुए उन्होंने कहा कि एक सन्यासी को लगा भारत कई टुकड़ों में बटा है तो उन्होंने देश की चारों दिशाओं में पीठ स्थापित कर भारत को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया। स्वामी विवेकानंद जब संन्यास लेने जा रहे थे तब रामकृष्ण परमहंस ने उनसे कहा था, मनुष्य का जीवन केवल अपने लिए नहीं होता।
वास्तविक संन्यास समाज सेवा में है। उनके मूलमंत्र पर ही स्वामी विवेकानंद ने भारतीय अध्यात्म और सांस्कृतिक परंपरा का पाठ पूरी दुनिया को पढ़ाया। विश्वामित्र, वशिष्ट, वेदव्यास, नानक गोविंद सिंह, तेगबहादुर वंदा वैरागी की परंपरा को गोरक्ष पीठ के महंत गोपालनाथ से लेकर अवेद्यनाथ ने आगे बढ़ाया। उसी का प्रतिफल यहां का एमपी शिक्षा परिषद एवं विश्वविद्यालय है।