लोक वाद्ययंत्र बजाते लोक गायक।
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नगाड़ा-मृदंग की जुगलबंदी। हुड़का के संग गूंजती ढोलक की थाप। ऐसे कई लोक वाद्यों का ‘कोरस’ अब पूर्वांचल की गीत-संगीत की महफिलों के लिए गाजे-बाजे के नए युग का आगाज है। पुरातन दौर में जबरदस्त गूंज कर चुके कई वाद्य खास जाति या जनजाति के अपने ‘साज’ बनकर रह गए थे। वादकों के लिए उनके संगीत का जौहर उनकी जमात का गुरूर था तो अवाम के लिए खास वाद्य की आवाज खास जनजाति की शिनाख्त कराती थी। पुरा संगीत और वाद्यों के संरक्षण की एक कोशिश ने जहां जमीनी स्तर से जुड़े प्रमुख साजों को नई जिंदगी देने के रास्ते बनाए हैं, वहीं जाति-जनजाति की छाप से उबारकर इन्हें जन-जन तक ले जाने की कोशिश की भी की है।
इस दिशा में सार्थक पहल की है संगीतकार हरिप्रसाद सिंह ने। संगीत एवं नाटक अकादमी नई दिल्ली के सहयोग से पूर्वांचल की माटी में रचे-बसे 20 लोक वाद्यों को नए परिवेश में पेश करने का खाका तैयार किया गया है। गोरखपुर के संगीतकार हरिप्रसाद सिंह के निर्देशन में डेढ़ साल पहले ऐसी कोशिशों की शुरुआत की थी। लोक वाद्यों से जुड़े पूर्वांचल के विभिन्न क्षेत्रों के कलाकारों को सहेजकर उन्होंने चार टीमें तैयार कीं। फिर 29 जनवरी को शहर में एक कार्यक्रम में सभी को एक संयुक्त टीम के तौर पर प्रदर्शन का मौका दिया गया। नगाड़ा बजाने वाले लालमन ने मृदंग पर थाप दे रहे प्रकाश सिंह से जुगलबंदी की तो वहीं पारस के हुड़का का साथ जकाउल्ला की ढोलक ने दिया। इन वादकों के लिए ये यादगार मौका था। इससे पहले कभी उन्होंने इन वाद्यों को एक साथ बजते नहीं देखा था। सुनने वालों ने खास तरह के वाद्यों और उनसे उपजे कोरस को हाथों हाथ लिया।
अब हरिप्रसाद सिंह के पास जिले में नगाड़ा, मृदंग, ढोलक, पखावज, हुड़का, खजड़ी, चंग, धपंग, एकतारा, करताल, सिंहा, सिंही, छड़, कसावर, झाल, जोड़ी, बांसुरी, डमरू, शंख और ताशा के साथ इन्हें बजाने वाले 54 कलाकारों की टीम है। इस टीम को बड़ा मंच दिलाने के लिए वह कुछ संस्थाओं से संपर्क साधा गया है। सब सही रहा तो जल्द ही ये टीम देश की राजधानी में पूर्वांचल के वाद्यों की तान छेड़ेगी। इसी इलाके में तैयार होने वाली भोजपुरी फिल्मों की संगीत लहरियों तक सीमित इन वाद्यों की स्वर सरिता के बॉलीवुड के संगीतमय सागर में समाहित होने के रास्ते भी तैयार हो सकते हैं।