जो विवाद में माफ कर दे वह है राम -मोरारी बापू
गोरखपुर। रामचरित मानस के अयोध्या कांड का वर्णन तीन चरणों में किया गया है। जैसे व्यक्ति के जीवन में बाल्यावस्था, युवावस्था और उत्तरावस्था होती है उसी तरह अयोध्या कांड भी बालकांड, युवावस्था और उत्तरावस्था में बंटा है। बाल्यकाल में सुख ही सुख है, युवावस्था प्रेम की है, इसमें दुख है और उत्तरावस्था में सुख। तुलसी की रामचरित मानस भी पहले सुख फिर दुख और अंत में सुख देती है। रामकथा के अंतिम दिन संत मोरारी बापू ने अयोध्या कांड प्रसंग और रामराज्य की स्थापना के साथ कथा को विश्राम दिया। अंतिम दिन करीब 30 हजार श्रद्धालु रामकथा का रसपान करने पहुुंचे।
मोरारी बापू ने वैदिक मंत्रोच्चार, शिव आराधना और हनुमान स्तुति के बाद रामकथा का आरंभ किया। बोले, राम शब्द का अर्थ अनंत है, सुखदायक और आनंददायक है। जो सबको प्रिय लगे वह राम है। अब कोई राम नहीं लेकिन जो सबको प्यारा लगे समझना उसमें राम तत्व है। राम का मूल ही सुखप्रद, आनंद दाता है। जो विवाद में माफ कर दे वह राम है।
अयोध्या कांड के प्रथम चरण यानी बाल्यावस्था में सुख ही सुख है। बाल्यकाल में पीड़ा मां सहती है और बच्चा मौज करता है। क्या बनना है, क्या खाना है, क्या करना है इससे बच्चे को कोई मतलब नहीं सिर्फ आनंद ही आनंद। युवावस्था में दुख है, क्योंकि इस अवस्था में प्रेम है। प्रेम में दुख है। जिसने सुख समझ कर प्रेम किया उसने प्रेम किया ही नहीं। प्रेम धर्म में पीड़ा ही पीर है, पीर ही औलिया है। प्रेम अयोध्या कांड में युवावस्था का काल है लेकिन इसमें पीड़ा है।
श्रद्धालुओें को समझाया कि परमात्मा जिस हाल में रखे अनुकंपा माननी चाहिए। मेरे परमात्मा ने जो मुझे दिया वो विशाल वियोग भी मेरे लिए प्रसाद है। पीड़ा मिलने पर संशय न करो। संशय आदमी को कमजोर करता है और विश्वास आदमी को दृढ़ करता है। रामचरित मानस को खूब पियो और जियो कभी संशय नहीं रहेगा। उत्तरावस्था में सुख है, लंका और रावण का उद्धार करने के बाद भगवान राम और जानकी का मिलन होता है। 14 वर्ष के बाद भगवान राम अयोध्या पहुंचते हैं तो सबसे पहले जन्मभूमि की पूजा करते हैं। भरत और भगवान राम एक दूसरे के गले मिलते हैं तो यह पता ही लगता कि 14 वर्ष तक किसने वनवास किया। भगवान राम ने राजगद्दी संभाली इसका उत्सव लंबे समय तक मनाया गया। लवकुश की जन्म का वर्णन करने के साथ ही संत मोरारी बापू ने कथा का समापन किया।
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इनसेट
शरणागत के होते हैं सात लक्षण
गोरखपुर। बापू ने भक्त को शरणागत बताया। कहा कि संगीत की तरह शरणागत की भी सप्तक होती है। सप्तक का पालन करने वाला ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त होता है। बल्ख बुखारा के बादशाह इब्राहीम का प्रसंग सुनाया। बताया कि उस समय गुलाम खरीदे-बेचे जाते थे। इब्राहीम ने एक खूबसूरत युवक से पूछा मैं तुम्हें रखना चाहता हूं, तुम्हारा मूल्य क्या है। युवक बोला जो आप दोगे। कहां रहोगे, जहां आप रखोगे। क्या खाओगे, जो आप खिलाओगे। क्या पिओगे, जो आप पिलाओगे। कहां सोओगे, जहां आप सुलाओगे। कब जागोगे, जब आप जगाओगे। क्या करोगे जो आप कराओगे। यही जीवन का सत्य है, शरणागत जब अपनी इच्छा अपने मालिक को सौंप देता है तो मालिक उसे सर्वोच्च पद पर पहुंचा देता है।
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व्यास पीठ से चलचित्र के नहीं चरित्र चित्र के गीत गाए जाते हैं
गोरखपुर। बापू ने रामकथा के दौरान फिल्मी गीत भी गुनगुनाए। फिर बताया कि एक श्रद्धालु ने फिल्मी गीत गाने पर आपत्ति जताई। बोले कि फिल्मी गीतों को उनके संदर्भ में ही नहीं देखना चाहिए। चलचित्र में जो गीत गाया जाता है, वह व्यासपीठ पर आते ही चरित्र चित्र गीत हो जाता है। इसके भक्त और भगवान के संबंध के रूप में देखा जाना चाहिए। प्रेम में पीड़ा शब्द को परिभाषित करते हुए उन्होंने फिल्मी गीत... इसी में प्यार की आबरू वो जफा करें मैं वफा करूं, जो वफा भी काम न आ सके तो वही कहें कि मैं क्या करूं गुनगुनाया। इस गाने की आध्यात्मिक व्याख्या भी की।