अपने पुरखों की कब्र पर फूल चढ़ाती जेनिफर।
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कैंपियरगंज का नाम जिस अंग्रेज अफसर विलियम कैंपियर हार्बल के नाम पर पड़ा, उन्हीं की पोती अब दादा की यादों से उनके पूर्व इस्टेट को महकाने की तैयारी में हैं। उनके मन में न सिर्फ दादा की यादों को संवारने की हसरत कुलांचे मार रही हैं, बल्कि मां सिंथिया मार्स के साथ राजकुमारी की तरह वह जिस नेतवर कोठी में बचपन के दिनों में रहीं, उसका भी कायाकल्प करना चाहती हैं। शुक्रवार को मां और दादा की यादों को टटोलती हुई 75 वर्षीय जेनिफर डाफने बॉल एक बार फिर गोरखपुर आईं। शाम को उन्होंने अपने पुरखों की कब्र पर फूल चढ़ाए और लोगों से इस माटी से जुड़ी यादें साझा कीं।
जेनिफर ने बताया कि दादा के नाम पर आज भी काफी जमीन है। मां की नेतवर में जागीर है। यहां से जुड़ी यादें कभी भुला नहीं सकतीं। ये यादें, हमेशा खुशनुमा रहें, इसके लिए वह यहां गरीबों के लिए स्कूल और हॉस्पिटल खोलना चाहती हैं। उन्होंने बताया कि इंग्लैंड में वकालत से खाली होने के बाद 2000 में पहली बार इंडिया आने का मौका मिला। तब नैनीताल प्रवास के दौरान उन जगहों पर घूमीं, जहां बचपन में पढ़ाई की थी। उसी दौरान ड्राइवर से गोरखपुर की यादें साझा कीं। 2015 में दोबारा इंडिया आने का मौका मिला तो ड्राइवर गोरखपुर लेकर आया। यहां दादा से जुड़े रहे स्वर्गीय संत प्रसाद के बेटे शैलेंद्र श्रीवास्तव से मुलाकात हुई। इसके एक साल बाद फिर यहां आने का मौका मिला तब कैंपियरगंज और नेतवर घूमने गई।
शुक्रवार को पैडलेगंज ग्रेवयार्ड पर जब जेनिफर दादा समेत अपने 11 पुरखों की कब्र पर फूल चढ़ाने गईं तो उनके साथ संत प्रसाद के पोते शिशिर श्रीवास्तव ‘मुकुल’ भी मौजूद रहे। शिशिर ने बताया कि जेनिफर डाफने बॉल उनके इलाहीबाग स्थित आवास पर ठहरी हैं। इस बार भी उन्हाेंने कैंपियरगंज और नेतवर भ्रमण की इच्छा जताई है।