जेई-एईस से दिव्यांग हुए बच्चों को मिलेगी राहत
एहतेशाम उद्दीन अहमद
गोरखपुर। जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) से पूर्ण या आंशिक दिव्यांगता का शिकार हुए बच्चों और उनके परिजनों के लिए राहत भरी खबर है। इन मरीजों को अब दवा लेने के लिए बीआरडी मेडिकल कॉलेज या जिला अस्पताल नहीं आना होगा बल्कि स्वास्थ्य विभाग उन्हें घर के करीब ही पीएचसी, सीएचसी पर यह सुविधा उपलब्ध कराएगा।
अब स्टॉक खत्म होने के बावजूद इन मरीजों को बिना दवा उपलब्ध कराए नहीं लौटाया जाएगा।
जेई और एईएस बीमारी की चपेट में आने वाले अधिकतर बच्चों की शारीरिक, मानसिक क्षमता सामान्य बच्चों की तुलना में कम हो जाती है। कुछ बच्चे स्थायी रूप से शारीरिक या मानसिक दिव्यांगता का शिकार हो जाते हैं। इनके अलावा कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जो आंशिक रूप से शारीरिक, मानसिक कमजोरी का शिकार होते हैं।
इन बच्चों का इलाज लंबे समय तक चलता है। अभी तक यह दवाएं बीआरडी मेडिकल कॉलेज या जिला अस्पताल से ही बांटी जाती हैं। दवा लेने के लिए इन बच्चों के परिजनों को प्रतिमाह मेडिकल कॉलेज या जिला अस्पताल आना पड़ता है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार यह दिव्यांग अधिकतर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के परिवारों के हैं।
ऐसे में दवा के लिए परिवार के सदस्यों को एक दिन की दिहाड़ी छोड़नी पड़ती है। जिला मुख्यालय आने जाने के लिए किराया आदि का भी खर्च करना पड़ता है। अब इन मरीजों को पास के ही पीएचसी, सीएचसी पर ही दवा उपलब्ध कराई जाएगी। जिला मुख्यालय की ओर से सभी सीएचसी, पीएचसी को दवा का स्टॉक उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। यदि स्वास्थ्य केंद्र पर दवा खत्म हो गई और मरीज आया तो केंद्र प्रभारी बाहर से दवा खरीद कर उपलब्ध कराएगा।
जेई, एईएस से दिव्यांगों की संख्या करीब छह सौ
स्वास्थ्य विभाग की ओर से वर्ष 2017 में मस्तिष्क ज्वर के कारण दिव्यांग होने वालों के लिए विशेष चिकित्सा शिविर का आयोजन किया था। उस शिविर में मंडल के गोरखपुर, देवरिया, महराजगंज और कुशीनगर जिलों में करीब छह सौ मरीजों का पंजीकरण किया गया था। वर्तमान में गोरखपुर मंडल में दिमागी बुखार के कारण बीमार होने वालोें की संख्या कितनी है स्वास्थ्य विभाग इसका रिकॉर्ड तैयार कर रहा है।
जेई-एईएस के कारण आंशिक दिव्यांगता का शिकार हुए बच्चे लंबे समय तक इलाज होने पर सामान्य जीवन पा सकते हैं। स्वास्थ्य विभाग का प्रयास ऐसे बच्चों को निदान और पुनर्वास के जरिए जीवन की मुख्यधारा में शामिल कराना है। इन बच्चों को दवा की कमी न हो इसके लिए करीब के ही स्वास्थ्य केंद्रों पर दवा उपलब्ध कराई जाएगी।
जनार्दन मणि त्रिपाठी, अपर निदेशक स्वास्थ्य, गोरखपुर मंडल