गीताप्रेस की आर्थिक दुश्वारियों में घिरने की अफवाहों के बीच संस्था की किताबें खूब बिकीं। संस्था ने इस साल पिछले साल के मुकाबले दो करोड़ 10 लाख रुपये की पुस्तकें ज्यादा बेची हैं। इसमें कल्याण की बिक्री शामिल नहीं है।
बता दें कि गीताप्रेस को लेकर सोशल मीडिया पर रह-रहकर आर्थिक दुश्वारियों में घिरे होने की खबरें चलती रही हैं। कभी गीताप्रेस के नाम पर चंदे की अपील की गई तो कभी यह बताया गया कि संस्था अपने कर्मचारियों को वेतन देने की स्थिति में भी नहीं है। हालांकि ये महज अफवाहें थीं, पर शायद ये अफवाह संस्थान की किताबों के लिए प्रचार का काम कर गई। इस बार संस्था की पुस्तकों की बिक्री से जुटी रकम कमोबेश ऐसा ही कह रही हैं। इस साल गीताप्रेस ने पुस्तकें बेचकर 54.6 करोड़ रुपये जुटाए हैं, जबकि पिछले साल यह रकम 52.5 करोड़ थी। दो लाख पाठकों वाली कल्याण पत्रिका के आंकड़े इसमें शामिल नहीं हैं। इसे भी शामिल कर लिया जाए तो कुल कलेक्शन करीब 59 करोड़ पहुंच जाएगा।
गीता, रामचरित मानस, भागवत और शिवपुराण की खूब मांग
गीताप्रेस में विभिन्न भाषाओं में करीब दो हजार पुस्तकें प्रकाशित होती हैं। इनमें से करीब 1700 पुस्तकें ऐसी हैं जिनका प्रकाशन लगभग नियमित है। इन पुस्तकों की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण संस्था की विश्वसनीयता और किताबों की कीमत का बाजार भाव के सापेक्ष बेहद कम होना भी है। देश ही नहीं विदेशों में भी इन पुस्तकों के कद्रदान हैं। गीताप्रेस की सर्वाधिक बिकने वाली पुस्तकों में गीता, रामचरित मानस, भागवत और शिवपुराण प्रमुख हैं।