जीडीए का हाल, मानचित्र ऑनलाइन, वसूली का ‘खेल’ ऑफलाइन
गोरखपुर। गोरखपुर विकास प्राधिकरण (जीडीए) में भले ही मानचित्र के आवेदन एक साल से ऑनलाइन ही स्वीकार किए जाते हों, लेकिन वसूली का धंधा पहले प्रचलित ऑफलाइन-जैसा ही फल-फूल रहा है। ऑनलाइन प्रक्रिया के बाद सबसे पहले आवेदन संबंधित अवर अभियंता (जेई) के पास पहुंचता है। कई मामलों में वहीं से सौदेबाजी शुरू हो जाती है। सौदा बना तो आवेदन में जो खामियां होती हैं, उन्हें दुरुस्त कराके या नजरअंदाज करके आगे बढ़ा दिया जाता है। इसकी जानकारी भी संबंधित सहायक अभियंता (एई) को पहले दी जाती है। जेई-एई से हरी झंडी मिलने के बाद ऊपर बैठे अफसर बहुत ज्यादा गौर नहीं करते और मानचित्र स्वीकृत हो जाता है। सभी अभियंता भले ही इस वसूली का हिस्सा न हाें, मगर कई के नाम, बदनाम हैं। आला अफसर भी दबी जुबां मानते हैं, मगर कार्रवाई के नाम पर उन्हें सांप सूंघ जाता है।
जानकारी के मुताबिक दो सौ वर्ग मीटर में निर्माण के मानचित्र को सचिव और उससे अधिक के निर्माण का मानचित्र उपाध्यक्ष स्वीकृत करते हैं। सभी तरह के व्यावसायिक मानचित्र भी उपाध्यक्ष ही स्वीकृत करते हैं। हालांकि फाइलें नीचे से ऊपर तक जाती हैं, इस कारण अधिशासी अभियंता व उससे ऊपर के अफसरों को ‘खेल’ की ज्यादा जानकारी नहीं हो पाती है। हां, इतना जरूर पता रहता है कि नीचे के अफसरों ने कुछ ‘खेल’ जरूर किया है। तभी फाइल इतनी जल्दी पहुंची है। ऑफलाइन आवेदन की प्रक्रिया मानचित्र अनुभाग से शुरू होती थी, लिहाजा ज्यादातर आवेदक पहले वहीं पहुंचते हैं। वहां तैनात कुछ बाबू पहले सौदेबाजी करते हैं। हिस्सेदारी की बात करके अवैध वसूली करते हैं। ऐसा मामला सामने आ चुका है। महिला कर्मचारी दीपा प्रियदर्शिनी तिवारी को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है।
20 हजार की घूसखोरी और अलग-अलग लिफाफे मिले थे 70 हजार
एंटी करप्शन ने भले ही 20 हजार रुपये घूस मांगने के आरोप में जीडीए की महिला कर्मचारी दीपा प्रियदर्शिनी तिवारी को गिरफ्तार किया था लेकिन उनके दफ्तर की छानबीन के दौरान 70 हजार रुपये और बरामद किए गए थे। महिला कर्मचारी को टीम जब दोबारा लेकर जीडीए पहुंची तो उसकी मेज की दराज से आठ-दस लिफाफे बरामद किए गए। हर लिफाफे में तीन से 15 हजार रुपये रखे थे। सभी पर कुछ कोड भी दर्ज थे। अब सवाल यह उठता है कि जब मानचित्र का आवेदन ऑनलाइन ही किया जा सकता है तो फिर दीपा ने किस तरह शिकायतकर्ता शैलेश कुमार श्रीवास्तव से उनका मानचित्र स्वीकृत कराने का दावा कर रुपये लिए, जबकि शैलेश का आवेदन दो बार निरस्त हो चुका था।
आवेदन निरस्त करने में जीडीए सूबे में सबसे दागदार
मानचित्र के आवेदन फार्म निरस्त होने और अवैध निर्माण के मामले में करीब छह महीने पहले तक जीडीए यूपी में पहले स्थान पर था। शासन स्तर पर हुई समीक्षा में पाया गया था कि जीडीए में मानचित्र के 60 फीसदी आवेदन निरस्त कर दिए जाते हैं। इस मामले में प्रमुख सचिव आवास एवं शहरी नियोजन ने तीन सदस्यीय कमेटी को जांच भी सौंपी थी। कमेटी के सदस्यों ने दो दिन गोरखपुर में रहकर जीडीए के संबंधित दस्तावेज की पड़ताल की और फिर शासन को रिपोर्ट दी थी। इसके बाद मामला ठंडा पड़ गया। हालांकि उस जांच में प्राधिकरण के अफसरोें ने दलील दी थी कि करीब 1500 एकड़ जमीन विनियमितीकरण की है, जहां मानचित्र स्वीकृत ही नहीं किए जा सकते। इसलिए आवेदन निरस्त करने पड़ते हैं।
आवेदन के पहले ही हो जाता है सौदा
पति की जगह 2010 में कनिष्ठ लिपिक के पद पर तैनाती पाने वाली दीपा की शिकायत पहले भी उच्चाधिकारियों के सामने आ चुकी है। सूत्रों के मुताबिक कुछ जेई के साथ मिलकर वह मानचित्र के आवेदनों में अच्छी कमाई करती थी। आवेदन फार्म भरने से पहले ही आवेदन का तरीका बताने से लेकर आपत्तियों के निस्तारण के नाम पर रेट तय होता था, जिसमें कुछ अन्य कर्मचारियों के साथ ही जेई-एई का भी कुछ हिस्सा होता था।
एक ही स्थान पर लंबे समय से जमा हैं कुछ जेई
प्राधिकरण के कुछ जेई और कर्मचारी लंबे समय से एक ही क्षेत्र या पटल पर जमे हैं। दो साल पहले पूर्व उपाध्यक्ष वैभव श्रीवास्तव ने हर छह महीने पर जेई और प्रवर्तन दल के कार्यक्षेत्र में बदलाव का निर्णय किया था मगर उसपर अमल नहीं हो पाया।
वर्जन
सबकी निगरानी की जाती है। कोई भी अभियंता या कर्मचारी किसी भी काम के लिए रुपये मांगता है तो उसकी शिकायत सचिव या उपाध्यक्ष से की जा सकती है। कड़ी कार्रवाई की जाएगी। सभी जेई को निर्देश दिया गया है कि मानचित्र समेत सभी समस्याओं का समय से निस्तारण करें।
- राम सिंह, सचिव, जीडीए
किसे बचा रहा जीडीए, क्यों नहीं हो रही विभागीय जांच ?
शिकायतकर्ता ने तीन अभियंता और दो बाबू के खिलाफ दिया है सबूत
सीसीटीवी कैमरे की रिकार्डिंग तक नहीं कराई गई सुरक्षित
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। भ्रष्टाचार निवारण कमेटी द्वारा दफ्तर के भीतर घूस लेते रंगे हाथ दीपा प्रियदर्शिनी को पकड़े जाने और शिकायतकर्ता शैलेश कुमार श्रीवास्तव की तरफ से इस ‘खेल’ में और अभियंताओं-कर्मचारियों की मिलीभगत का आरोप लगाने के बाद भी जीडीए के अफसरों की चुप्पी कई तरह के सवाल खड़े कर रही है। शिकायतकर्ता ने उपाध्यक्ष ए. दिनेश कुमार को साक्ष्य के तौर पर कुछ ऑडियो सुनाए थे। उनमें दीपा के अलावा कुछ और अभियंताओं और बाबू की बातें रिकार्ड है। शैलेश का आरोप है कि जीडीए में कुछ अभियंताओं का पूरा रैकेट प्राधिकरण में सक्रिय है जो मानचित्र स्वीकृत कराने के नाम पर वसूली करता है। दीपा तो इस रैकेट की एक छोटी-सी किरदार है। शैलेश का आरोप है कि उनसे दीपा के अलावा कुछ अभियंताओं ने भी घूस की मांग की थी।
शैलेश ने शनिवार को भी उपाध्यक्ष से मिलकर और लोगों के खिलाफ भी जांच कराकर कार्रवाई करने की मांग की थी। उन्होंने तीन अभियंता, दो बाबू और एक असिस्टेंट का नाम भी लिया। बावजूद इसके अभी तक इस सनसनीखेज मामले की जांच तो दूर सीसीटीवी कैमरों की रिकार्डिंग तक सुरक्षित करना मुनासिब नहीं समझा गया। इस मामले में जीडीए उपाध्यक्ष ए. दिनेश कुमार से संपर्क करने की कोशिश की गई, मगर बात नहीं हो पाई। उनका पक्ष आने पर उसे भी प्रकाशित किया जाएगा।