आपका अगर किसी विभाग में आना-जाना है तो वहां के बारे में काफी कुछ पता चल जाता है। मगर मत्स्य विभाग है कि उसे अपने ही विभाग के कामों की जानकारी नहीं है। गोरखपुर में विभिन्न स्रोतों से मछली का कुल कितना उत्पादन हो रहा है और जिले में उसकी खपत कितनी है? इसकी जानकारी विभाग के जिम्मेदार तक को नहीं है। इस पर जिला स्तरीय अधिकारी का कहना है कि इसकी जानकारी करने की कभी उन्हें जरूरत ही नहीं पड़ी।
आम तौर पर राज्य सरकार की ओर से विभागों के जिलास्तरीय दफ्तर इसीलिए खोले जाते हैं, जिससे पूरे जिले की जानकारी जिला स्तरीय अधिकारी के जरिए उसे मिल सके। इसी परिकल्पना पर गोरखपुर में जिला मत्स्य अधिकारी का दफ्तर भी खोला गया है। इसके संचालन पर राज्य सरकार प्रतिमाह लाखों रुपये केवल वेतन भत्ते पर खर्च कर रही है।
विभाग के पास यह जानकारी तो है कि जिले के चार हजार तालाबों से गत वर्ष 43 हजार 52 क्विंटल और दो डैमों से 87 क्विंटल मछली का उत्पादन हुआ है। मगर यह नहीं पता है कि जिले में प्रतिमाह मछली की कुल कितनी खपत है? तालाबों और डैमों के अलावा अन्य स्रोतों से जिले में मछली की कितनी पैदावार हो रही है? अन्य प्रांतों से प्रतिदिन या प्रतिमाह कितना आयात-निर्यात होता है। जिले में सर्वाधिक कौन सी मछली खाई जाती है? आदि की जानकारी से विभाग अनभिज्ञ है।
बाहर की मछलियां हो सकती हैं खतरनाक
अन्य प्रांतों से आने वाली मछली की प्रजाति और मात्रा से भले ही मत्स्य विभाग अनभिज्ञ हो। मगर जानकार बताते हैं कि गोरखपुर में आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र से प्रतिदिन कई क्विंटल मछलियां लाई जा रही हैं, जो दो-तीन दिन में यहां पहुंचती है। ऐसे में सवाल उठता है कि इस गर्मी में बाहर से आने वाली मछली खाकर अगर कोई बीमार होता है तो मत्स्य विभाग अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकता।
अन्य प्रांतों से आने वाली मछली और जिले में कुल उत्पादन की जानकारी की विभाग को कभी जरूरत नहीं पड़ी। हम तो अपने तालाबों और दो डैमों के बारे में जानकारी रखते हैं। बाकी कौन कहां से मछली मंगा रहा है और कौन बेच रहा है? कितने का कारोबार हो रहा है? इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं है।
- पुष्पारानी तिवारी, जिला मत्स्य अधिकारी, गोरखपुर