अलीनगर स्थित ऐतिहासिक बरगद का पेड़।
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गोरखपुर की माटी गदर की थाती है। शहर में ऐसे कई स्थान हैं जहां पहली जंग-ए-आजादी के निशां बाकी हैं। प्रथम स्वाधीनता संग्राम के 159 साल बाद भी ये निशानियां हमें हमारे गौरवशाली इतिहास से रू-ब-रू कराती हैं। खुदगर्जी और फिरकापरस्ती के विस्तार के बीच ये धरोहरें गंगा-जमुनी तहजीब की इंकलाब हैं। गदर की 160वीं वर्षगांठ पर आज हम आपको ऐसी ही कुछ विरासतों की सैर पर ले चलते हैं।
कुर्बानियों का साक्षी बूढ़ा बरगद
अलीनगर चौराहे से पश्चिम देखने पर पुराना बरगद नजर आता है। ये कोई आम दरख्त नहीं बल्कि इसने सदियां देखी हैं। गदर के समय आजादी के मतवालों के आगे फांसी के तख्ते कम पड़ गए। तब अंग्रेजों ने बर्बरता दिखाई और कई दरख्तों पर लोगों को फंदों से लटका दिया। पुरानी जेल और घंटाघर में पाकड़ पर क्रांतिकारियों को फांसी दी गई तो वहीं अलीनगर में बरगद पर कइयों को लटकाया गया। कुछ लोग मानते हैं कि बंधू सिंह को भी अलीनगर के इसी पेड़ पर फांसी दी गई तो कुछ पुरानी जेल के कुएं को वह जगह बताते हैं। घंटाघर का दरख्त अब बाकी नहीं है, लेकिन पुरानी जेल का पाकड़ और अलीनगर का बरगद शहादत की जड़ों पर आज भी तना नजर आता है।
गंजे शहीदां की मजार
खूनीपुर में गंजे शहीदां की मजार वह निशानी है जो अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता का अहसास कराती है। क्रांतिकारी सरफराज अली की तलाश में अंग्रेजों ने मुहल्ला सौदागरा में छापा मारा। वह नहीं मिले तो मुहल्ले में तबाही मचाकर उनके करीबी होने के शक में 300 लोगों को पकड़ ले गई। इन्हें पुरानी जेल के पाकड़ पर फांसी दे दी गई। क्रांतिकारियों की लाशों की भी बेकद्री की गई। दो कब्रों में एक साथ कई लोगों को दफना दिया गया। अंग्रेजी जुल्म-ओ-सितम की गवाह इन कब्रों को आज गंजे शहीदां के नाम से जाना जाता है।
कोतवाली में सरदार अली खां की मजार
नखास स्थित कोतवाली कभी मुअज्जम अली खां की हवेली हुआ करती थी। सरदार अली खां पहली जंगे आजादी के योद्धा थे। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जाने की वजह से उन्हें और उनके परिवार के कई लोगों को शहादत देनी पड़ी। पहली जंगे आजादी के इस दीवाने की मजार आज भी कोतवाली में मौजूद है। उनकी मजार के आसपास परिवार वालों की भी मजारें हैं। आज यहां सुबह शाम चिरागा होता है।
गदर की निशानियों को चाहिए थोड़ी कदर
शहर में ऐसी कई तमाम निशानियां गदर की गौरवगाथा की प्रतीक हैं। फिर भी इनमें से ज्यादातर निशानियां वक्त की मार के चलते मिटने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। ऐसे में अगर जिम्मेदार इनकी बाबत न चेते तो शायद आने वाली पीढ़ियां अपने इस गौरवशाली अतीत के दीदार से महरूम हो जाएंगी।