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अनशन पर कर्मचारी, मरीजों की हुई सांसत

Wed, 17 Feb 2016 02:11 AM IST
गोरखप़ुर। अमर उजाला ब्यूरो
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गोरखपुर। 15 महीने से मानदेय न मिलने पर मेडिकल कॉलेज के संविदा कर्मचारियों का धैर्य मंगलवार को जवाब दे गया। सुबह आठ बजे ड्यूटी पर आने के साथ ही वे अनशन पर बैठ गए। इसके चलते ट्रॉमा सेंटर में इलाज की व्यवस्था चरमरा गई। जूनियर डॉक्टर वार्ड ब्वाय की भूमिका में नजर आने लगे और तीमारदारों को नर्स की जिम्मेदारी निभानी पड़ी।
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 प्रमुख सचिव की ओर से सप्ताह भर में मानदेय देने के आश्वासन के बाद शाम चार बजे कर्मचारी इस चेतावनी के साथ काम पर लौटे कि यदि तय मियाद पर मानदेय नहीं मिला तो फिर अनशन शुरू किया जाएगा।


इस बेमियादी अनशन की भूमिका 10 फरवरी को ही बन गई थी जब कर्मचारियों ने रजिस्टर चिट्टी के जरिए प्राचार्य को इस विरोध की जानकारी दी थी। हालांकि प्राचार्य ने ऐसी किसी चिट्ठी के मिलने से इनकार किया है। मंगलवार को सुबह आठ बजे ट्रॉमा सेंटर गेट पर कर्मचारी अनशन पर बैठ गए और भाषणों का दौर शुरू हो गया।
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सबने मानदेय न मिलने से होने वाली दुर्दशा बयां की और इसके लिए मेडिकल कॉलेज की निष्क्रियता को जिम्मेदार ठहराया। अनशनकारियों का नेतृत्व कर रहे अखिल भारतीय संविदाकर्मी महासंघ के अध्यक्ष सुनील श्रीवास्तव ने कहा कि कई संविदाकर्मियों के घरों में चूल्हा न जलने जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है।


 अनशन की सूचना जब प्राचार्य प्रो. राजीव मिश्र को मिली तो वे साढ़े 10 बजे ट्रॉमा सेंटर पहुंचे और चार लोगों को बातचीत के लिए बुलाया, लेकिन कर्मचारी प्राचार्य को अनशन स्थल पर बुलाने पर आमादा थे। बात बिगड़ती देख प्राचार्य खुद अनशन स्थल पर पहुंचे और एक सप्ताह में मानदेय दिलाने का आश्वासन दिया, मगर कर्मचारी लिखित आश्वासन मांग रहे थे।


कर्मचारियों की संतुष्टी के लिए प्राचार्य ने प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा से बात की और महासंघ के अध्यक्ष सुनील से भी बात कराई लेकिन उनके जुबानी आश्वासन से भी बात नहीं बनी। ऐसे में प्राचार्य ने केंद्र सरकार को इस बाबत भेजे गए फैक्स की प्रति संविदा कर्मियों के पास भेजवाई तब जाकर उन्होंने अनशन तोड़ने का फैसला किया। अनशन के आठ घंटों में ट्रॉमा सेंटर के मरीजों की दुर्दशा हो गई। जैसे-तैसे पूरा दिन बीता। कुछ ने तो हारकर खुद को उच्च संस्थान के लिए रेफर करा लिया।



केंद्र और राज्य के फेर में फंसा मानदेय
गोरखपुर। ट्रॉमा सेंटर शुरू होने के बाद तीन वर्ष तक मानदेय देने का जिम्मा केंद्र सरकार ने खुद लिया था, लेकिन सेंटर के तय समय से साल भर बाद शुरू होने से मामला फंस गया। केंद्र सरकार का कहना था कि मानदेय की तीन वर्ष की नियोजित धनराशि भेजी जा चुकी है, जबकि कॉलेज प्रशासन ने एक करोड़ 52 लाख रुपये की जरूरत का प्रस्ताव प्रदेश सरकार के माध्यम से केंद्र को भेज दिया।


 केंद्र सरकार की ओर से इसे लेकर जांच-परख चलती रही। हालांकि मेडिकल कॉलेज के प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक भुगतान की प्रक्रिया पूरी हो गई है और बहुत जल्द धनराशि जारी कर दी जाएगी। उधर, केंद्र व स्टेट की लिखा-पढ़ी के फेर में दर्जनों कर्मचारी और डॉक्टर काम छोड़ कर चले गए। हालांकि यह समस्या सिर्फ कुछ दिनों की है क्योंकि प्रदेश सरकार ने ट्रॉमा सेंटर के स्थायी कर्मचारियों के लिए पद स्वीकृत कर दिए हैं। बहुत जल्द नियुक्ति प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।
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