लखनऊ में पार्टी में पड़ी सियासी दरार की गहराई ने जिले तक के सपाइयों को झकझोर दिया है। टी-20 मैच से भी तेज बदली इस सियासत ने चंद घंटों के भीतर सपाइयों के चेहरे पर कई रंग उकेर दिए। किसी को दीपावली बिगड़ती नजर आई तो कोई खामोशी से जश्न मना रहा था। पान की दुकान से लेकर पार्टी कार्यालय तक तरह-तरह की चर्चाओं का बाजार गर्म रहा। कोई टीवी से चिपका रहा तो कोई फोन पर ही लखनऊ में अपने सूत्रों को खंगालता रहा। मगर किसी भी तरह के बयान से हर छोटा-बड़ा सपाई बचता ही रहा। प्रतिक्रिया के लिए किसी की जुबां खुली भी तो सिर्फ इतनी ही कि भगवान जाने आगे क्या होगा।
करीब डेढ़ महीने से पार्टी के भीतर मची घमासान ने सपाइयों को हिलाकर रख दिया है। शीर्ष स्तर पर हो रहे बदलावों के साथ ही सभी की गणित भी बदलती रही। पहले शिवपाल व उनके करीबियों का प्रभाव कम होना और फिर पार्टी के मुखिया की दखल के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश के करीबियों पर हुए वार का सपाई कोई सियासी निहतार्थ निकाल पाते कि अब अचानक फटे ‘अखिलेश बम’ ने सभी को एक बार फिर चौंका कर रख दिया। समाजवादी घरौंदे के बिखरते ही जिले स्तर पर भी कई को अपना सियासी सफर कठिन होता दिखने लगा।
जिला कार्यकारिणी से लेकर विधानसभा टिकट तक में बदलाव की उम्मीद लगाए बैठे शिवपाल समर्थकों के ख्वाब अचानक चकनाचूर हो गए। मुलायम के हस्तक्षेप के बाद शिवपाल के बढ़े कद से उनके समर्थक पिछले पखवारे भर से अधिक समय से अपनी-अपनी गोटी सेट करने में जुट गए थे। सहकारी बैंक के पूर्व चेयरमैन जहां जिलाध्यक्ष की कुर्सी की दावेदारी में जुटे थे वहीं हाल ही में एक महत्वपूर्ण चुनाव में अचानक गणित बदल जाने से पैदल हो गए पूर्व मंत्री को भी काफी उम्मीदें बंधी थीं।
इसके उलट शिवपाल पर हुई कार्रवाई से ग्रामीण विधानसभा से टिकट के लिए संघर्ष कर रहे मुख्यमंत्री अखिलेश गुट के करीबी माने जाने वाले अल्पसंख्यक नेता के चेहरे पर मुस्कान लौट आई है। चूंकि विधानसभाओं में भी टिकट के बंटवारे में शिवपाल का प्रभाव रहा है लिहाजा वहां भी अब बदलाव की कयासबाजी शुरू हो गई है।