गोरखपुर।
नेपाली नागरिकों के फर्जी
पासपोर्ट बनाने में दोषी पाए
गए लोगों पर कार्रवाई न होने
की शिकायत पर डीआईजी ने मामले
की फाइल तलब की है। मामले की
जांच करने वाले एसपी (ग्रामीण)
के साथ ही
कैंट और शाहपुर थाने में दर्ज
मामले की विवेचना कर रहे दरोगा
को दस्तावेज के साथ बुलाया
गया है। फर्जी पासपोर्ट जारी
करने के मामले में एलआईयू,
पुलिस के
30
दरोगा और
सिपाही दोषी मिले थे जिनके
खिलाफ अब तक र्कोई कार्रवाई
नहीं हुई है।
वर्ष
2005
से 2009
के बीच शहर
के कूड़ाघाट,
शाहपुर के
पते पर 91
नेपाली मूल
के लोगों ने पासपोर्ट के लिए
आवेदन किया था। पुलिस,
एलआईयू
कीवेरिफिकेशन के बाद 60
लोगों को
पासपोर्ट मिल गया। वर्ष 2009
में भारत
-
नेपाल मैत्री
समाज के तत्कालीन अध्यक्ष
मोहन लाल गुप्ता ने किराए पर
कमरा लेकर रहने वाले नेपाली
नागरिकों को गोरखपुर का निवासी
बताकर पासपोर्ट दिए जाने की
शिकायत तत्कालीन आईजी से की
थी। अधिकारियों की जांच में
मामला सही मिला। वेरिफिकेशन
करने पर 31
लोग पासपोर्ट
में दर्ज पते पर ही नहीं मिले।
छानबीन करने पर आसपास के लोगों
ने भी जानकारी से इन्कार कर
दिया। जांच में पुलिस व एलआईयू
के दरोगा,
सिपाहियों
के फंसने से अधिकारी इस मामले
में कार्रवाई से बच रहे थे।
मामला शासन के संज्ञान में
आने पर एसपी (ग्रामीण)
ब्रजेश
सिंह ने अक्टूबर 2014
में पूरे
मामले की नए सिरे से जांच की।
इसमें कैंट क्षेत्र के पते
पर पासपोर्ट बनवाने वाले 26
और शाहपुर
के पते पर पासपोर्ट बनवाने
वाले पांच लोग दोषी मिले थे।
नवंबर 2014
में एसपी
ग्रामीण की रिपोर्ट थाने पहुंच
गई लेकिन थानेदार मुकदमा दर्ज
करने में हीलाहवाली कर रहे
थे। कैंट पुलिस ने 16
जुलाई 2015
को मोहनलाल
गुप्ता की तहरीर पर 26
और शाहपुर
पुलिस ने पांच नेपाली नागरिकों
पर फर्जी दस्तावेज तैयार कर
जालसाजी करने और 17
पासपोर्ट
अधिनियम के तहत केस दर्ज किया
था। मुकदमा के वादी मोहनलाल
गुप्ता की एक माह पहले मौत हो
गई। नेपाल मंत्री समाज के अन्य
पदाधिकारियों ने डीआईजी को
प्रार्थना पत्र देकर जालसाजी
करने वाले पुलिसकर्मी और
एलआईयू के लोगाें पर कार्रवाई
न होने की शिकायत की थी।