बड़े नोटों पर पाबंदी और बैंक की लंबी लाइन ने एक महिला की जान ले ली। मां के इलाज की खातिर बेटा रुपये के लिए बैंक की लाइन में लगा था और उधर अस्पताल में मां की जान चली गई। दुखी बेटा बार-बार यही कह रहा है कि एकाउंट में रुपये होने के बाद भी मैं मां का इलाज नहीं करा पाया।
पीपीगंज के राजाबारी गांव की मेहावती (55) के पति बाहर नौकरी करते हैं, जबकि मां बेटे प्रमोद कन्नौजिया के साथ रहती थीं। एक हफ्ते पहले सांस की तकलीफ बढ़ने पर उन्हें बेटे ने एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया था। बेटे के पास जो भी रुपये थे वह इलाज के लिए जमा कर चुका था। वह बेहतर इलाज के लिए मां को हाई स्पेशियलिटी सेंटर ले जाना चाहता था। इसके लिए उसे रुपयों की जरूरत थी। वह सोमवार की सुबह साढ़े सात बजे ही पीपीगंज की एसबीआई की शाखा में पहुंच गया। प्रमोद के मुताबिक वहां बैंक खुलने से पहले ही लंबी लाइन लग चुकी थी। वह भी लाइन में लगा, लेकिन दोपहर तक उसका नंबर नहीं आया। रुपये का इंतजाम न हो पाने से वह निराश होकर अस्पताल में मां के पास लौट आया, मगर वहां थोड़ी देर बाद ही उसकी मां की मौत हो गई।
मां की मौत से बेसुध प्रमोद बार-बार यही कह रहा था कि खाते में रुपये होने के बावजूद वह मां का बेहतर इलाज नहीं करा सका। प्रमोद ने बताया कि यदि रुपये समय से मिल गए होते तो मां की जान बच जाती। वह बैंक इसी उम्मीद से गया था कि रुपये का इंतजाम हो जाएगा। प्रमोद ने बताया कि उसके मेरे खाते में बीस हजार रुपये थे और पिता के खाते में भी रकम थी, लेकिन अब तो जीवन भर मुझे यही मलाल रहेगा कि रुपये के अभाव में मां की जान चली गई।