मेहरौनाघाट (देवरिया)। गरीबों के लिए चलाई जा रही सरकार की तमाम योजनाएं एक गरीब मजदूर के किसी काम न आईं। पल्लेदारी करके बच्चों का पेट पाल रहे लार नगर निवासी पशुपति राजभर के दो कुपोषित बच्चों की सही खुराक और सही इलाज न मिलने के कारण जान चली गई। आंखों के सामने ढाई घंटे के अंतराल से सात साल की बेटी और पांच साल के बेटे ने दम तोड़ दिया और हालात के आगे मजबूर मजदूर भाग-दौड़ करके भी उन्हें बचाने में कामयाब नहीं हो सका। प्रशासन ने मामले की जांच कराने का भरोसा दिया है।
बेबसी का सामना करने वाले पशुपति राजभर के आसपास रहने वाले गयागीर वार्ड के लोगों के मुताबिक पशुपति की बेटी खुशबू (7) और बेटा अजय (5) सरकारी प्राइमरी स्कूल में कक्षा और एक में पढ़ाई करते थे लेकिन करीब 20 दिन से दोनों की तबीयत खराब होने के कारण जहां बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे थे। पल्लेदारी से रोज कमाकर घर के खाने का बंदोबस्त करने वाले पशुपति ने लार सीएचसी पर बच्चों को दिखाया तो डॉक्टर ने कुपोषण को बच्चों की बीमारी की मुख्य वजह बताया। दवाई के साथ अच्छी खुराक की नसीहत देते हुए बेहतर इलाज के लिए गोरखपुर मेडिकल कॉलेज ले जाने का सुझाव दिया। गोरखपुर जाकर रहने और बच्चों की दवा व खाने-पानी के बंदोबस्त के लिए पशुपति 30 हजार रुपये कर्ज लेकर गोरखपुर मेडिकल कॉलेज पहुंचा लेकिन एक हफ्ते में यह रकम खर्च हो जाने पर बृहस्पतिवार को घर वापसी कर ली।
बृहस्पतिवार दोपहर बाद बच्चों की तबीयत फिर बिगड़ी तो दोनों को लेकर लार सीएचसी पहु्ंचे। वहां से जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। देवरिया जिला अस्पताल पहुंचते ही खुशबू की मौत हो गई, जबकि अजय को लखनऊ पीजीआई ले जाने की सलाह दी गई। हालात से टूटे पशुपति ने घर पहुंचकर बेटी का शव पट्टीदारों के हवाले किया और बेटे अजय को बचाने की कोशिश में फौरन लार रोड रेलवे स्टेशन का रुख किया। लखनऊ जाने के लिए पशुपति कृषक एक्सप्रेस का इंतजार कर रहा था कि इसी बीच स्टेशन पर ही अजय ने भी दम तोड़ दिया। सिर्फ ढाई घंटे के अंतराल से बेटा-बेटी की जान जाने से पशुपति की हालत विक्षिप्तों जैसी हो गई। आसपास के लोगों ने पैसा जुटाकर दोनों बच्चों के दफन का बंदोबस्त किया। एसडीएम घनश्याम का कहना है कि इस मामले की जानकारी नहीं मिली थी। अब लेखपाल को क्षेत्र में भेजकर जांच कराएंगे।
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कुपोषण के शिकार थे दोनों
लार सीएचसी के अधीक्षक डॉ. बीबी सिंह के मुताबिक दोनों बच्चे कुपोषण के शिकार थे। सीएचसी पर दोनों को जरूरी दवाएं दी गईं। बेहतर इलाज के लिए जिला अस्पताल रेफर किया था। यह उम्मीद नहीं थी कि दोनों को बचाया नहीं जा सकेगा।
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पत्नी छोड़ा, बच्चों की मौत ने तोड़ा
ढाई घंटे में बेटा और बेटी गंवाने वाले पशुपति के हाल से हर कोई दंग
राशन कार्ड न होने पर उठे सवाल
अमर उजाला ब्यूरो
मेहरौनाघाट (देवरिया)। पल्लेदारी से जुटने वाली रकम से दो बच्चों के साथ जीवन यापन करने वाले पशुपति राजभर के जीवन में चुनौतियों की शुरुआत तीन साल पहले पत्नी के घर छोड़ जाने से हुई। बताते हैं कि पांच साल पहले लुधियाना (पंजाब) में जाकर मजदूरी से पशुपति ने जीवन यापन लायक आमदनी का बंदोबस्त कर लिया था लेकिन पत्नी के घर छोड़ने पर बेटा-बेटी की परवरिश की चुनौती वापस लार नगर ले आई और यहां कम आमदनी वाली पल्लेदारी को दिनचर्या का हिस्सा बनाना पड़ा।
पल्लेदारी की आमदनी पर निर्भरता के बावजूद बच्चों को सरकारी प्राइमरी स्कूल में दाखिल किया। बेटी खुशबू क्लास दो में तो बेटा अजय कक्षा एक में पढ़ाई कर रहे थे लेकिन बिना पत्नी के घर में जहां बच्चों की देखभाल ढंग से नहीं हो पाती थी, वहीं पशुपति की कम आमदनी से बच्चों को भरपेट भोजन की भी दिक्कत आती थी। आसपास के लोगों ने बताया कि कोशिश के बाद भी राशन कार्ड नहीं बना लेकिन एक सरकारी योजना से उसे आवास की सुविधा मिल गई थी। बच्चे दिन के भोजन की जरूरत स्कूल के मिडडे मील से पूरी कर लेते थे लेकिन रात में कई दफा खाने की जगह बिस्किट से ही काम चलाते थे।
ऐसे में बच्चे कमजोर होते गए। बुखार और उदासी में घिरने पर उन्हें डॉक्टर को दिखाने की जरूरत महसूस की लेकिन लार सीएचसी से लेकर गोरखपुर मेडिकल कॉलेज तक की भागदौड़ के बाद भी बच्चों को बचा नहीं सका।
आंखों के सामने ढाई घंटे के अंतराल से बेटा-बेटी को दम तोड़ते देखने के बाद से पशुपति बदहवास है। कभी किस्मत को तो कभी सरकारी अमले को कोसते हुए गरीबों का न्याय न मिलने की बात रह-रह कर कह रहा है। नजदीक रहने वालों ने भी राशन कार्ड न बनने पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि अगर राशन कार्ड बना होता तो बच्चों को खिलाने लायक खाद्यान्न सस्ता मिल सकता था लेकिन उसकी यह कोशिश कामयाब नहीं हुई।