गोरखपुर।
जेल में मोबाइल फोन के इस्तेमाल और डॉ. शिवशंकर शाही से रंगदारी मांगने के मामले में कई अफसरों की कुर्सी खतरे में हैं। मामले की जांच डीआईजी जेल यादवेंद्र शुक्ला ने लगभग पूरी कर ली है। अब कॉल डिटेल निकाली जा रही है। इसके लिए उन्होंने एसएसपी सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज और एसपी क्राइम आलोक शर्मा से संपर्क साधा है।
डीआईजी की प्रारंभिक जांच से पता चला है कि जेल अधिकारियों, बंदी रक्षकों की लापरवाही से शातिर बदमाश संजय यादव को मोबाइल फोन मिला और वह डॉक्टर से रंगदारी मांग बैठा। इससे अफसरों की पोल खुल गई। इसी जांच को अंतिम रूप देने के इरादे से डीआईजी जेल ने गोरखपुर में डेरा डाल दिया है। रिपोर्ट जल्द ही शासन को दी जाएगी, फिर विभागीय कार्रवाई शुरू होगी। सूत्रों का कहना है कि कॉल डिटेल में भी जेल से रंगदारी मांगने की बात सामने आई है। जैसे ही जिला पुलिस की रिपोर्ट मिलेगी, वैसे ही रिपोर्ट शासन को दी जाएगी।
कैरेक्टर रोल पर लाल निशान
गोरखपुर जेल की सुरक्षा में तैनात कई अफसरों के कैरेक्टर रोल बेहद खराब हैं। सर्विस डायरी लाल पेन से भरी है। लाल पेन का मतलब खराब कैरेक्टर से है।
सुरक्षा पुख्ता, फिर भी सेंधमारी
प्रदेश की संवेदनशील जेलों में गोरखपुर जेल में त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरा है। पीएसी मुख्य गेट की निगरानी करती है। इसके बाद भी जेल में बंद बदमाश ठाठ से रह रहे हैं। डॉक्टर से रंगदारी प्रकरण ने सीएम के शहर वाली जेल में सेंधमारी पर मोहर लगा दी थी।
10 साल से जमे हैं बंदीरक्षक
जेल की सिस्टम को ध्वस्त करने में कई बंदी रक्षकों पर कार्रवाई हो चुकी है। लेकिन हालात नहीं सुधरे। नियम-कानून ताक पर रखकर 15 बंदी रक्षक 10 वर्षो से जमे हुए हैं। इनके ट्रांसफर की सुगबुगाहट होते ही अफसर आंख बंद कर लेते थे। बंदी रक्षकों ने गोरखपुर में मकान भी बनवा लिया। जांच में इसकी पुष्टि भी हो चुकी हैं। लेकिन जेल में मलाई काट रहे बंदी रक्षक इतने सालों से जस के तस पड़े हैं, जबकि आईजी ने छह वर्ष में ट्रांसफर का आदेश दे रखा है।
कोट
संजय यादव ने जेल से डॉ. शाही से रंगदारी मांगी थी। उसके पास मोबाइल फोन कैसे आया, इसकी जांच चल रही हैं। कुछ अफसरों की लापरवाही सामने आई है। साक्ष्य जुटाकर शासन को रिपोर्ट दी जाएगी। अलग-अलग मामलों में छह जांचें अभी लंबित हैं।
- यादवेंद्र शुक्ल, डीआईजी जेल