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संविधान अधिकार और कर्तव्य को परिभाषित करने की पुस्तिका: जनपद न्यायाधीश

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संविधान अधिकार और कर्तव्य को परिभाषित करने की पुस्तिका: जनपद न्यायाधीश
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गोरखपुर। संविधान अधिकार और कर्तव्य को परिभाषित करने वाली पुस्तिका है। हम अधिकार की बात तो दमदारी से करते हैं लेकिन कर्तव्य के प्रति सचेत नहीं होते हैं। कानून की व्याख्या एवं परिभाषित करना एक दुरूह ( कठिन) कार्य है। उक्त विचार मुख्य अतिथि जनपद न्यायाधीश गोविंद बल्लभ शर्मा गोष्ठी के दौरान रखे। मौका दिवंगत शशि शंकर पति त्रिपाठी ‘गांधी’ के 28 वीं पुण्यतिथि पर बार एसोसिएशन सिविल कोर्ट के सभागार में आयोजित संविधान के संरक्षण में न्यायपालिका की भूमिका विषय आयोजित गोष्ठी का था।
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बार काउंसिल आफ उत्तर प्रदेश के सदस्य मधुसूदन त्रिपाठी ने कहा कि न्यायपालिका सर्वोच्च है परंतु उसकी अधिकारिता संविधान में परिभाषित है। उसके परे वह न तो कोई कार्य कर सकती है एवं न ही विचार कर सकती है। मुख्य वक्ता हरिनंदन श्रीवास्तव ने कहा कि आज हम अपने संवैधानिक दायित्वों का ईमानदारी से निर्वाह नहीं कर पा रहे, इसी कारण आज न्याय जगत के प्रति लोगों का विश्वास एवं आस्था प्रभावित हो रही है। अपर न्यायाधीश पवन तिवारी ने कहा कि लंबित मुकदमों की संख्या आज न्याय जगत से जुड़े सभी लोगों को मालूम है। सभी के संयुक्त प्रयास से इसका निराकरण संभव है। बार एसोसिएशन के मंत्री अजय कुमार शुक्ला ने संगोष्ठी के आयोजकों के प्रति आभार ज्ञापित किया। संचालन वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पत्रकार डॉ. सुभाष शुक्ला ने किया। धन्यवाद ज्ञापन धर्मेंद्र कुमार मिश्र ने किया। वरिष्ठ अधिवक्ता हरिप्रकाश मिश्रा, ब्रिज बिहारी लाल श्रीवास्तव, अनूप पांडेय, जितेंद्र धर दुबे ने भी अपने विचार रखे। इस दौरान अनूप मिश्रा, पद्मा मिश्रा, रामनारायण धर दुबे, शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव, संजय मोहन त्रिपाठी, मदन कुमार त्रिपाठी, विजय शंकर पति त्रिपाठी, उमापति उपाध्याय, धीरेंद्र धर दुबे, दीप्ति नारायण धर दुबे, वीरेंद्र लाल श्रीवास्तव, उमाशंकर पति त्रिपाठी, अनामिका पांडेय, ललिता पांडेय, धीरेंद्र नाथ शुक्ला आदि मौजूद रहे।
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