प्री-मेच्योर डिलीवरी में नवजात की सुरक्षा के लिए गर्भवतियों को अब सरकारी अस्पतालों में भी कॉर्टिकोस्टेरॉयड का इंजेक्शन दिया जा सकेगा। निजी प्रेक्टिशनर इसका पहले से इस्तेमाल करते थे। अब इसके सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में भी इस्तेमाल की अनुमति दे दी गई है। इससे शिशु मृत्यु दर में 30 फीसदी तक कमी आने की उम्मीद जताई गई है।
इस सिलसिले में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की अपर निदेशक डॉ. काजल की ओर से सभी सीएमओ और एसआईसी को निर्देश जारी किए गए हैं। विभागीय सूत्र बताते हैं कि स्टेरॉयड के नवजात पर दुष्प्रभाव के अंदेशे में प्री-मेच्योर डिलीवरी के मामले में इस इंजेक्शन के इस्तेमाल से बचा जाता था। अलबत्ता निजी चिकित्सक ही नहीं अन्य विकसित देशों में समय से पहले जन्मने वाले बच्चों की सुरक्षा के लिए गर्भवती को निर्धारित अवधि पर कॉर्टिकोस्टेरॉयड का इंजेक्शन दिया जाता है।
सरकारी चिकित्सकों की मांग और सुझाव पर इसे लेकर अध्ययन कराने के बाद सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में भी इसके इस्तेमाल को हरी झंडी दे दी गई है। चिकिरत्सक बताते हैं कि अमूमन प्रसव के 18 घंटे पहले यह इंजेक्शन दिया जाता है। बाकी जरूरत और परिस्थिति के हिसाब से निर्णय लेते हैं। बहुत मामूली कीमत पर यह इंजेक्शन सहज उपलब्ध रहता है।
एडिशनल सीएमओ डॉ. नंद कुमार ने बताया कि पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के ट्रेनिंग प्रोग्राम में इस इंजेक्शन के इस्तेमाल और शुरुआत कराने पर गहन चर्चा हुई थी। अब सरकारी अस्पतालों को इसके इस्तेमाल के लिए कह दिया गया है। इसके प्रयोग से शिशु मृत्यु दर 30 प्रतिशत तक घटा लेने की उम्मीद है।
फेफड़े की मजबूती से सहज होती है सांस
विशेषज्ञ बताते हैं कि बच्चे के जन्म लेते ही पहली जरूरत उसकी श्वसन प्रक्रिया सामान्य करने की होती है। प्री-मेच्योर डिलीवरी में अपरिपक्व नवजात के फेफड़े पूर्ण विकसित नहीं होते। गर्भवती को कॉर्टिकोस्टेरॉयड इंजेक्शन देकर गर्भस्थ शिशु के फेफड़े की मजबूती और सांस लेने की प्रक्रिया को बेहतर किया जा सकता है।