डॉ. राकेश राय
गोरखपुर। आवेदन के बावजूद पिछले दो सालों से नेशनल एसेसमेंट एक्रेडेशन काउंसिल ‘नैक’ मूल्यांकन के लिए गोरखपुर यूनिवर्सिटी खुद को तैयार नहीं कर सकी, उस पर कॉलेजों को जल्द से जल्द मूल्यांकन कराने की नसीहत दे रही है। शासन के दबाव में यूनिवर्सिटी की ओर से कॉलेजों को भेजे जा रहे नोटिस में साफ कहा गया है कि वे ‘नैक’ मूल्यांकन की प्रक्रिया शीघ्र शुरू करें, जिससे शासन की ओर से इसे लेकर तय लक्ष्य को पाया जा सके।
‘नैक’ को लेकर बेफिक्र यूनिवर्सिटी की अचानक उपजी इस चिंता की वजह शासन का एक अगस्त को जारी वह आदेश है, जिसमें उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधार को लेकर चिंता जताई गई है। साथ ही ‘नैक’ मूल्यांकन के बाद गुणवत्ता में सुधार की गुंजाइश तलाशने की बात कही गई है। सिर्फ इतना ही नहीं, इस कार्य में तेजी लाने के लिए शासन की ओर से तय एक योजना की जानकारी दी गई है। लक्ष्य-2016 नाम की इस योजना में शासन ने इस वित्तीय वर्ष में प्रदेश भर की 300 उच्च शैक्षणिक संस्थाओं के ‘नैक’ मूल्यांकन कराए जाने का लक्ष्य रखा है। लक्ष्य निश्चित तौर पर हासिल हासिल हो, इसके लिए पूरे साल को दो भागों में बांटा है। पहले 150 का लक्ष्य सितंबर 2016 तक और दूसरे 150 का लक्ष्य मार्च 2017 तक पाना तय किया गया है। दरअसल ‘नैक’ मूल्यांकन को लेकर कई बार रिमांइडर के बाद भी जब शैक्षणिक संस्थानाें ने रुचि नहीं दिखाई तो शासन को ‘लक्ष्य’ का रुख अख्तियार करना पड़ा। ‘नैक’ के लिए शासन के इस नए प्रयास से यूनिवर्सिटी प्रशासन में तेजी तो आई है लेकिन खुद को लेकर नहीं बल्कि कॉलेजों को लेकर। यूनिवर्सिटी के आंतरिक गुणवत्ता सुनिश्चयन प्रकोष्ठ के निदेशक प्रो. एचएस बाजपेयी ने कॉलेजों को पत्र लिखकर शासन के इस नए लक्ष्य की जानकारी तो दी ही है, साथ ही प्रक्रिया आगे बढ़ाने की जानकारी से यूनिवर्सिटी को अवगत कराने की बात भी कही है।
ग्रेडिंग गिरने का भय ‘नैक’ की अड़चन
चार साल के अंतराल के बाद दो साल पहले गोरखपुर यूनिवर्सिटी प्रशासन ने जिस उत्साह से नेशनल ‘नैक’ मूल्यांकन के लिए आवेदन किया, उतनी खामोशी से मूल्यांकन प्रक्रिया की गति पर विराम भी लगा दिया। दरअसल प्रक्रिया रोकने की वजह 2005 में मिली ग्रेडिंग के गिरने का भय है। तत्कालीन कुलपति प्रो. अरुण कुमार ने जब 2005 में ‘नैक’ मूल्यांकन कराया था तो यूनिवर्सिटी को B++ रैंक हासिल हुई थी। 2010 में ग्रेडिंग की पांच वर्ष की अवधि पूरी हुई। इस दौरान हर विभाग से शिक्षक रिटायर होते गए लेकिन नियुक्तियां नहीं हुईं। जाहिर तौर पर शिक्षण कार्य और शोध की गुणवत्ता का स्तर भी गिरता गया। अब ऐसे में यदि यूनिवर्सिटी ‘नैक’ मूल्यांकन का दुस्साहस कर भी बैठती है तो उसे रैंक को लेकर मुंह की खानी पड़ सकती है।