इंसेफेलाइटिस से विकलांग हुए बच्चों के इलाज के लिए शनिवार को आयोजित दो दिवसीय पुनर्वास शिविर महज घंटे भर के अंदर खुद ‘विकलांग’ हो गया। उद्घाटन के बाद जैसे ही कमिश्नर अनिल कुमार और दूसरे प्रशासनिक अफसर कैंप से निकले वहां अव्यवस्था फैल गई। गोरखपुर और देवरिया के दूर-दराज क्षेत्रों से सफर कर पहुंचे दिव्यांगों और उनके घरवालों को न केवल जमीन पर बैठना पड़ा बल्कि इलाज के लिए अपना नंबर आने का घंटों इंतजार भी करना पड़ा। यही नहीं तमाम विभागों के विशेषज्ञ तो दूर पर्याप्त डॉक्टर भी शिविर में नहीं पहुंच सके। जो पहुंचे भी वे समय से नहीं रहे। दिव्यांगों को परेशान देखकर सीडीओ डॉ मन्नान अख्तर ने खुद आला संभाल लिया और आधे घंटे के अंदर छह दिव्यांगों का परीक्षण किया। आईएएस होने के साथ ही वह डॉक्टर भी हैं। वर्ष 2004 में उन्होंने गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की है।
शिविर का सच कमिश्नर को सुबह तभी पता लग गया, जब उनके पहुंचने के बाद भी शिविर में एक-दो डॉक्टर को छोड़कर वहां कोई डॉक्टर नहीं दिखा। उन्होंने उसी समय इसपर सवाल खड़ा किया। पहले तो सीएमओ बगलें झांकने लगे फिर मामला गंभीर होते देखकर उन्होंने डॉक्टरों के रास्ते में होने की दलील देकर कमिश्नर को भी गुमराह कर दिया। सुबह होने की वजह से ज्यादातर दिव्यांग अभी पहुंचे नहीं थे। इसलिए तत्काल में तो कोई विशेष दिक्कत सामने नहीं आई। मगर कमिश्नर के जाते ही जब दिव्यांग वहां पहुंचने शुरू हुए तो अफरा-तफरी का माहौल बन गया। स्वास्थ्य महकमे ने 400 दिव्यांगों के शिविर में पहुंचने की संभावना जताई थी, बावजूद इसके 50 से भी कम कुर्सियों के इंतजाम किए गए थे। नतीजतन, सैकड़ों दिव्यांगों और उनके घरवालों को जमीन पर बैठना पड़ा। यही नहीं शिविर में आए दिव्यांगों को मेडिकल सर्टिफिकेट जारी करने वाले कमरे के बाहर किसी तरह की कोई सूचना नहीं चस्पा की गई थी। परिजन अपने दिव्यांग बच्चों के साथ सर्टिफिकेट के लिए इधर-उधर भटकते मिले।
पहले दिन गोरखपुर से 287 और देवरिया से 81 मरीजों का पंजीकरण किया गया। वहीं, मंडल के बाहर के भी कुछ जिलों से दिव्यांग शिविर में पहुंचे। रविवार को कुशीनगर और महाराजगंज के दिव्यांगों का इलाज होगा। शिविर में एडी हेल्थ पुष्कर आनंद, प्राचार्य डॉ. राजीव मिश्रा, सीएमओ रवींद्र कुमार समेत कई लोग मौजूद रहे।
रात भर की ड्यूटी, नहीं खुली आंख
मेडिकल बोर्ड में गोरखपुर के बच्चों का परीक्षण कर स्वास्थ्य रिपोर्ट देने के लिए तैनात डॉक्टरों में से एक डॉ राजन शाही ने देर से पहुंचने के लिए जो अपनी दलील दी वह भी चौंकाने वाली थी। उनका कहना है कि रात की ड्यूटी होने के बावजूद, सुबह शिविर में भी उनकी ड्यूटी लगा दी गई। कहा कि सतर्क होने के बाद भी सुबह समय से उनकी आंख नहीं खुल सकी।
वालंटियरों ने संभाला बच्चों को बहलाने का जिम्मा
मेडिकल कॉलेज में आने वाले बच्चों में कुछ बच्चे इंसेफेलाइटिस की वजह से दिव्यांग हुए थे तो कुछ जन्म से दिव्यांग थे। इन बच्चों को इलाज में देर होने की वजह से परिजनों को संभालने में दिक्कत हो रही थी। शिविर में मौजूद फातिमा अस्पताल की जेएनएम की छात्राओं ने बच्चों को खाने-पीने के सामान देने के साथ ही खेल में उन्हें व्यस्त कर परिजनों की मदद की।
खलीलाबाद के धर्मेंद्र ने संभाली खिलाने की जिम्मेदार
गोरखपुर। मेडिकल कॉलेज में आयोजित शिविर में खलीलाबाद के धमेंद्र और उनके भाई चंद्रेश कुमार ने नि:शुल्क भोजन की व्यवस्था की थी। इन्होंने बताया कि अखबारों के माध्यम से जब शिविर की जानकारी हुई तो उन्होंने श्रमदान करने का फैसला किया और जरूरी बंदोबस्त के साथ सुबह चले आए। उनके साथ पांच वेटर समेत नौ खानसामों की भी टीम थी। वहीं, इलाहाबाद बैंक के कर्मचारी और आयोजनकर्ता बीके श्रीवास्तव की तरफ से आटा और छोले-बठूरे का इंतजाम किया गया था। मंडल के सभी जिलों के ब्लॉक से प्रशासन को अपने वाहनों से इन बच्चों को मेडिकल कॉलेज लेकर आना था लेकिन बच्चों के परिजन निजी वाहनों से लेकर पहुंचे थे। अपने वाहनों से इन बच्चों को मेडिकल कॉलेज इलाज के लिए लेकर आए। पहले दिन शिविर में गोरखपुर और देवरिया के दिव्यांग बच्चे और उनके घरवाले मेडिकल कॉलेज पहुंचे थे।
आयोजन शिविर में अगर कोई डॉक्टर समय से नहीं पहुंचा है तो इसकी जांच की जाएगी। शिविर में आने वाले किसी बच्चे और उसके परिजनों को दिक्कत न हो इसके लिए पूरा इंतजाम किया गया है।
-डॉ. पुष्कर आनंद, एडी हेल्थ।