संसद तक पहुंचने की चुनावी जंग में भले ही 10 प्रत्याशियों के बीच सियासी तलवारें भांजी गईं, लेकिन अपने नेता के सम्मान में कई सूरमा मैदान में थे। अपने उम्मीदवार के लिए वोट सहेजने की जुगत में जुटे ये महारथी, गांव-जवार में जीजान से लगे रहे। इस सियासी रण में ‘सेनापति’ की भूमिका निभाने वाले ये धुरंधर अंतत: अपनों की दगाबाजी से खार खा बैठे। अब कहीं ‘दगाबाजों’ का राशन कार्ड काटने की तैयारी है तो किसी से आवासीय योजना में मिली रकम की रिकवरी के लिए योजना गढ़ी जा रही है।
मतदान के बाद अब ये ‘सेनापति’ अपने खास ‘सिपाहियों’ के साथ दगाबाजी और दगेबाजों की चर्चा में मशगूल हैं। कैंपियरगंज क्षेत्र में इसी तरह की चर्चा सुनने को मिली। ‘सिपाही’ ‘सेनापति’ को ‘दगाबाज’ अपनों के नाम गिना रहा था। इसके साथ ही ‘सेनापति’ की भृकुटियां आड़ी-तिरछी होती गईं। चेहरे पर कभी गुस्सा तो कभी अफसोस के भाव आए। सेनापति को वह दिन याद आ गया जब आधी रात को उन्होंने इसी अपने की मदद के लिए नींद बर्बाद की थी। न सिर्फ शारीरिक तौर पर साथ दिया था बल्कि उसे रुपये भी दिए थे। लेकिन आज जरूरत पर उसने नेता बदल दिया।
वाकया सुनाते हुए गांव के ये सरकार दगाबाजी की सजा तय करने में जुट जाते हैं। उन्हें उस आवास की याद आती है, जिसके लिए उन्होंने आशीर्वाद दिया था। रकम जारी हुई थी, लेकिन आवास नहीं बना था। दगाबाज को देख लेने और रकम की रिकवरी कराने की योजना तैयार करने की बात कहते हुए उन्होंने अपने सिपाही को थोड़ा संतोष करने के लिए कहा। तभी तपाक से सिपाही की ओर से कुछ और नाम सामने लाए गए और राशन कार्ड से ये नाम कटवाकर उन्हें दगाबाजी की सजा दिलाने की दरियाफ्त कर दी गई।