फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

भिखारी ठाकुर : लोक रंगकर्म की बहुआयामी शख्सियत

Sun, 10 Jul 2016 01:27 AM IST
डॉ. राकेश राय, अमर उजाला, गोरखपुर।
विज्ञापन
भिखारी ठाकुर
विज्ञापन
कविता हो या नाट्य निर्देशन या फिर संगीत और अभिनय का क्षेत्र। लोक रंगकर्म की हर विधा में भिखारी ठाकुर का न केवल दखल था बल्कि अधिकार भी। अगर समग्रता से उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का मूल्यांकन करें तो पूर्वांचल ही नहीं बल्कि समूचे भोजपुरी भाषी क्षेत्र में लोक संस्कृति के लिए अभियान चलाने वालों में वे सबसे आगे मिलेंगे। अपने मशहूर नाटक विदेसिया से पूर्वांचल की रग-रग में रच-बस जाने वाले ठाकुर की प्रतिभा देखकर ही राहुल सांकृत्यायन ने उन्हें अनगढ़ हीरा कहा था। भोजपुरी के शेक्सपीयर के नाम से मशहूर इस महान शख्सियत की पुण्यतिथि (10 जुलाई) पर शहर के विद्वानों ने उन्हें शिद्दत से याद किया।
विज्ञापन


भोजपुरी से मुनाफे की राह दिखाई
छिटपुट और इकलौते ढंग से भिखारी ठाकुर ने जिस तरह से कम समय में मंच और पंच का रिश्ता कायम किया, वह आसान नहीं था। दरअसल उन्होंने कला को जीवन में उतारने की ऐसी शैली विकसित की कि पंच जन मंच से अनचाहे ढंग से जुड़ता चला गया। इस क्रम में विदेशिया मील का पत्थर साबित हुई। इससे भोजपुरी को एक अलग मुकाम भी हासिल हुआ। जो भोजपुरी सिर्फ संवाद का माध्यम हुआ करती थी, वह मुनाफे की वजह बनती दिखी। हालांकि भिखारी ठाकुर का यह उद्देश्य नहीं था लेकिन मुनाफे की राह दिखी तो गांव से निकलकर भोजपुरी ने फिल्म नगरी मुंबई तक डंका बजवाया। लोकज्ञता और शास्त्रज्ञता के बीच पुल का काम करने वाले भिखारी ठाकुर के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। 
- रवींद्र श्रीवास्तव ‘जुगानी’, साहित्यकार 

लोक रंगमंच के जादूगर थे भिखारी
उड़ीसा के एक गांव में रामलीला देखने के दौरान भिखारी ठाकुर में लोक रंगमंच को लेकर जो रुचि जगी, वह पांच दशक तक पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा और बंगाल के भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में सिर चढ़कर बोली। इसी के चलते राहुल सांस्कृत्यायन जैसे साहित्यकार ने उन्हें भोजपुरी के शेक्सपीयर की उपाधि दी। गरीबी, नशा, बाल विवाह, अनमेल विवाह, भाई-भाई विवाद और अंध विश्वास जैसे लोक जीवन से जुड़े मुद्दों पर नाटकों और गीतों के जरिए उन्होंने जनमानस के दिल में इस कदर जगह बनाई कि जगदीश चंद माथुर ने लोकप्रियता के मामले में उन्हें तुलसीदास की श्रेणी में खड़ा कर दिया। उनकी प्रतिभा से ही प्रभावित होकर ही नाट्यशास्त्र के आचार्य सीताराम चतुर्वेदी ने उन्हें लोक रंगमंच का जादूगर कहा था। 
विज्ञापन
विज्ञापन

- डॉ. आद्या प्रसाद द्विवेदी, लोक साहित्य मर्मज्ञ
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें